व्यंग्य

 सुबह का समाचार पात्र हो या फिर शाम का टीवी प्राइम टाइम – मुझे हर रोज इन समाचारों, टीवी शो पर चलती ख़बरों मे कुछ न कुछ ऐसा मिल ही जाता है तो परस्पर-विरोधी, असंगत, हास्यास्पद होता ही है. अनेकानेक बार लगता है “हम्माम मे सब नंगे हैं”
फिर एक घटना घाटी है -मै खुली आँख से सपने देखने लगता हूँ – यह सपने अब्सर्ड (असंगत) से लग सकते हैं – कथावस्तु सीधी नहीं है लेकिन यह सपने फिर भी साझा कर रहा हूँ
इस उम्मीद के साथ की बहुत और भी होंगे मेरे जैसे जिनको ऐसे ही सपने आते होंगे


 

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सपना २२, 

सपना १०, 

सपना २१ , 

सपना ८ , 

सपना २० ,

सपना ७ , 

सपना १९, 

सपना ९ , 

सपना १८, 

सपना ६ , 

सपना १७ , 

सपना ५ , 

सपना १६, 

सपना ४, 

सपना १५ , 

सपना ३, 

सपना १४, 

सपना २, 

सपना १३, 

सपना १,

सपना १२, 

सपना 

सपना ११ ,