व्यंग्य

 सुबह का समाचार पत्र हो या फिर शाम का टीवी “प्राइम टाइम” – मुझे हर रोज इन समाचारों, टीवी शो पर चलती ख़बरों मे कुछ न कुछ ऐसा मिल ही जाता है तो परस्पर-विरोधी, असंगत, हास्यास्पद होता ही है. अनेकानेक बार लगता है “हमाम मे सब नंगे हैं”
फिर एक घटना घटती है -मै खुली आँख से सपने देखने लगता हूँ – यह सपने अब्सर्ड (असंगत) से लग सकते हैं – कथावस्तु सीधी नहीं है लेकिन यह सपने फिर भी साझा कर रहा हूँ
इस उम्मीद के साथ की बहुत और भी होंगे मेरे जैसे जिनको ऐसे ही सपने आते होंगे


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