Poem IX: अमरत्व किसी को नहीं प्राप्त

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तब जब मैं

रात के उगने पर

महफ़िल सजाकर

देश के भविष्य से लेकर जीवन मूल्यों तक

सुलगती सिगरेट के साथ कर रहा होता हूँ विचार विमर्श

 

वो बस्ती के

किसी कोने में

निश्चिन्त भाव से

तकिया सर के नीचे दबा

ऊंघ रहा होता है

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जानता है

सबकुछ वैसा ही रहेगा जैसा था कल

 

और मैं इस मुगालते मैं जीता हूँ

कि

अमरत्व किसी को नहीं प्राप्त

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Poem IX: नासूर

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मेरी विडम्बना मेरे नेता

जो पारंगत हैं चिकनी चुपड़ी बातें करने में

मेरा दुःख

शब्दों का अर्थ पहचानने कि ताकत

जिसने तोडा है जख्मी किया है

मेरी फसल

मेरे नेताओं के वादे

जिन्हे उन्होंने कभी पूरा नहीं किया

मेरी कमाई

नासूर

अब नासूर के बारे में क्या लिखूं

सिवाए इसके कि यह सदैव मेरे साथ है

Poem VIII: क्रोध

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मैं चाहता था कि

मेरी आँख का गिरता हुआ पानी

उसकी हथेली पर गिरे

लेकिन तब मालूम नहीं था

कि मेरी आँख से पानी नहीं

भाप निकलती है आजकल

और

उसकी हथेलियाँ मोम के  खिलोनो सी

भाप को छूने से पिघल जायेंगी

Poem VII: स्थिति

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मैं आजकल जहाँ कहीं भी होता हूँ

एक धरधराती हुई बस मेरा पीछा करती है

ताजुब कि बात है बस में कोई चालक नहीं

बस में अजीब अजीब चेहरे वाले लोग हैं

सींग वाले लोग चार आँख वाले लोग, तीन हाथ वाले लोग

वो मेरी लाचारी और नाकामयाबी पर लगाते हैं जोरदार ठहाके

और तभी वो स्वपन जो मैं तीन सालों से पाल रहा हूँ

बस कुचल देती है

पर क्या रपट करूं बस का कोई नंबर हो तो !!

Poem VI: सपना खरीदेगा

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सोचता हूँ

उसने किस खूँटी पर

टांगे होंगे अपने सपने

 

रास्ते पर खड़ा

पैसों को रुपये बनता रहा है

हर ठोकर को नकारता रहा है

 

मुझे आज गाडी में बैठा देखकर बोला

सलाम साहब

मैं चुप रहा कुछ देर

फिर उसे आठ आने दे दिए

 

उसने फिर कहा

सलाम साहब

 

सोचता हूँ

आठ आने से वो कौन सा

सपना खरीदेगा