Poem XX: स्मृतियाँ

0

Image

बंद दरवाजे के भीतर

पुरानी स्मृतियाँ

सरसराहट पैदा करती हैं

 

मनो पुराने फैसले पर

कहकहे लगा रही हों

और कह रही हों

‘हम पहले से न कहती थीं?’

विल वर्क फॉर फ़ूड

0

Poem 2

माँ कहती है
गरीबो की मदद किया करो
मैं जेब की चिल्लड़
कभी कभी बाँट दिया करता हूँ

पिताजी उनके हक़ मैं मोर्चे किया करते हैं

दोस्त केले वाले का टोकरा
उनके सर पर रखवा कर दुआ ले लेते हैं

नेताओं ने स्कीम बहुत सी निकाली हैं
शायद भला भी हुआ हो

बाकि बात सिर्फ इतनी है
चुगने वाले ज्यादा हैं
और
चुगने को दाने बहुत कम

poem 3

Poem XVIII: बहुत समय हुआ अब कलयुग भोगते

0

Image

समय यदि गोलाकार पथ पर परिक्रमा करता है

तो

मैं चाहूंगा कि आज के दिन उसकी परिक्रमा पूर्ण हो

 

फिर कल से वह जब अपनी नयी परिक्रमा प्रारभ करेगा

तो पुनः सतयुग का प्रारभ होगा

बहुत समय हुआ अब कलयुग भोगते

Image

Poem XVII: ‘वो भी होगा यहाँ!’

0

Image

जब वो पहले यहाँ आती थी

आते ही कहती थी

अरे ! वो भी है यहाँ

अब

वो यहाँ से निकलती है

तो अन्दर नहीं आती

न आने का कारण वो बतलाती है

‘वो भी होगा यहाँ!’

Poem XVI: चाहो तो गिरा दो चाहो तो अपना लो

0

Image

बाप ने भेजा है एक विशेष गुप्तचर

पता लगवाने हेतु

कि आखिर उस गुप्प अँधेरे में कौन है?

 

खबर आयी है

अवांछित है

सास ने सुझाया है

चाहो तो गिरा दो चाहो तो अपना लो

 

माँ जानती है उस अवांछित की नियति

बाप की चाहत पर निर्भर है

चाहो तो गिरा दो चाहो तो अपना लो

Image