आदिकाल के नामकरण की समस्या


क्या हिंदी साहित्य का प्रथम काल इतिहास का मध्य काल है.

(1000 से 1300 ई) तक का काल ही हिंदी साहित्य का प्रथम काल कहा जाता है. 

1000 ईस्वी मे भारत पर महमूद गज़नी ने हमला किया; जिसने आगे चलकर 1025 ईस्वी के आसपास सोमनाथ का मंदिर गिराया. इसी शृंखला में 1175 मे गोरी ने भारत पर हमला किया और 1190 मे पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया. 1206  के आसपास क़ुतबुद्दीन ऐबक का राज्य स्थापित हुआ जिसके बाद रज़िया सुल्ताना का शासन काल रहा. चंगेज खान भी इसी समय मे आया.

साफ़ देख सकते हैं की हिंदी साहित्य का प्रथम काल (जैसी हम आदिकाल भी कहते हैं) इतिहास की दृष्टि से दरअसल भारत का मध्यकाल है. यह ज्ञात होना जरुरी है नहीं तो कई बार साहित्य को समझने मे भ्रम हो जाता है

अलग अगल विद्वानों ने हिंदी साहित्य के प्रथम काल के क्या क्या नाम दिए हैं इसपर पहले बात कर लेते हैं

साहित्य के इतिहास के प्रथम काल का नामकरण विद्वानों ने इस प्रकार किया है-

  1. डॉ.ग्रियर्सन – चारणकाल,
  2. मिश्रबंधुओं – प्रारंभिककाल,
  3. आचार्य रामचंद्र शुक्ल- वीरगाथा काल,
  4. राहुल संकृत्यायन – सिद्ध सामंत युग,
  5. महावीर प्रसाद द्विवेदी – बीजवपन काल,
  6. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र – वीरकाल,
  7. हजारी प्रसाद द्विवेदी – आदिकाल,
  8. रामकुमार वर्मा – चारण काल

डॉ.ग्रियर्सन ने प्रथम काल को चरण काल कहा? ऐसा उन्होंने क्यों कहा ?

डॉ.ग्रियर्सन ने हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रथम काल को चारणकाल (चारण : कवि जो राजसत्ता के गुणगान में कविता लिखता है)नाम दिया है। उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रारंभ 643 ई. से माना है किन्तु उस समय की किसी चारण रचना या प्रवृत्ति का उल्लेख उन्होंने नहीं किया है। वस्तुतः इस प्रकार की रचनाएँ 1000 ई.स. तक मिलती ही नहीं हैं। इस लिए डॉ.ग्रियर्सन द्वारा दिया गया नाम योग्य नहीं है।

मिश्रबंधुओं का क्या मत है प्रथम काल के नामकरण को लेकर

मिश्रबंधुओं ने ई.स. 643 से 1387 तक के काल को प्रारंभिक काल कहा है। यह एक सामान्य नाम है और इसमें किसी प्रवृत्ति को आधार नहीं बनाया गया है। यह नाम भी विद्वानों को स्वीकार्य वहीं है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल – जो की हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन मे एक बहुत प्रतिष्ठित नाम है उन्होंने क्या कहा है इस काल के नामकरण को लेकर?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल का नाम वीरगाथा काल रखा है। राजाश्रित कवि अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन करते थे। यही प्रबंध परंपरा रासो के नाम से पायी जाती है, जिसे लक्ष्य करके इस काल को हमने वीरगाथा काल कहा है। अन्य साहित्य को (जैसे जैन साहित्य, सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य) को वह साहित्य की श्रेणी में नहीं मानते. शुक्ल जी वे इस काल की बारह रचनाओं का उल्लेख किया है-

  1. विजयपाल रासो (नल्लसिंह कृत-सं.1355),
  2. हम्मीर रासो (शांगधर कृत-सं.1357),
  3. कीर्तिलता (विद्यापति-सं.1460),
  4. कीर्तिपताका (विद्यापति-सं.1460),
  5. खुमाण रासो (दलपतिविजय-सं.1180),
  6. बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह-सं.1212),
  7. पृथ्वीराज रासो (चंद बरदाई-सं.1225-1249),
  8. जयचंद्र प्रकाश (भट्ट केदार-सं. 1225),
  9. जयमयंक जस चंद्रिका (मधुकर कवि-सं.1240),
  10. परमाल रासो (जगनिक कवि-सं.1230),
  11. खुसरो की पहेलियाँ (अमीर खुसरो-सं.1350),
  12. विद्यापति की पदावली (विद्यापति-सं.1460)

शुक्ल जी द्वारा किये गये वीरगाथाकाल नामकरण के संबंध में कई विद्वानों ने अपना विरोध व्यक्त किया है।  एक तो यह की वीरगाथा काल की महत्वपूर्ण रचना पृथ्वीराज रासो की रचना उस काल में नहीं हुई थी और यह एक अर्ध-प्रामाणिक रचना है। दूसरा कई रचनाओं का वीरता से कोई संबंध नहीं है। बीसलदेव रासो गीति रचना है। जयचंद्र प्रकाश तथा जयमयंक जस चंद्रिका -इन दोनों का वीरता से कोई संबंध नहीं है। ये ग्रंथ केवल सूचना मात्र हैं। अमीर खुसरो की पहेलियों का भी वीरत्व से कोई संबंध नहीं है। परमाल रासो पृथ्वीराज रासो की तरह अर्ध प्रामाणिक रचना है तथा इस ग्रंथ का मूल रूप प्राप्य नहीं है। कीर्तिलता और कीर्तिपताका- इन दोनों ग्रंथों की रचना विद्यापति ने अपने आश्रयदाता राजा कीर्तिसिंह की कीर्ति के गुणगान के लिए लिखे थे। उनका वीररस से कोई संबंध नहीं है। विद्यापति की पदावली का विषय राधा तथा अन्य गोपियों से कृष्ण की प्रेम-लीला है। इस प्रकार शुक्ल जी ने जिन आधार पर इस काल का नामकरण वीरगाथा काल किया है, वह योग्य नहीं है।

डॉ.रामकुमार वर्मा – जो की शुक्ल जी की ही तरह एक बहुत प्रतिष्ठित नाम है – के मतानुसार क्या नाम दिया गया है प्रथम काल को ?

 

 

डॉ. रामकुमार वर्मा ने हिंदी साहित्य के आदिकाल की कालाविधि सं ७५० से १३७५ तक मानकर इसे दो भागों मिह बांटा है.

1.संधिकाल (७५० से १००० वि.) तथा

2. चरण काल (१००० से १३७५ वि. तक)

उन्होंने संधिकाल में जैन, सिद्ध तथा नाथ साहित्य को व चारनकाल में वीरगाथात्मक रचनाओं को समाविष्ट किया है. संधिकाल दो भाषाओं एवं दो धर्मों का संधियुग है, जो वस्तुतः अपभ्रंश साहित्य ही है. चारनकाल तथा वीरगाथा काल की भांति ही दोषपूर्ण है क्योंकि इस सन्दर्भ में गिनाई गयी चारणों की रचनायें अप्रमाणिक एवं परवर्ती है.

राहुल संकृत्यायन के दिए नाम की भी बात कर लेते हैं

राहुल संकृत्यायन- उन्होंने 8वीं से 13 वीं शताब्दी तक के काल को सिद्ध-सांमत युग की रचनाएँ माना है। उनके मतानुसार उस समय के काव्य में दो प्रवृत्तियों की प्रमुखता मिलती है-

1.सिद्धों की वाणी- इसके अंतर्गत बौद्ध तथा नाथ-सिद्धों की तथा जैनमुनियों की उपदेशमुलक तथा हठयोग की क्रिया का विस्तार से प्रचार करनेवाली रहस्यमूलक रचनाएँ आती हैं।

2.सामंतों की स्तृति- इसके अंतर्गत चारण कवियों के चरित काव्य (रासो ग्रंथ) आते हैं, जिनमें कवियों ने अपने आश्रय दाता राजा एवम् सामंतों की स्तृति के लिए युद्ध, विवाह आदि के प्रसंगों का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया है। इन ग्रंथों में वीरत्व का नवीन स्वर मुखरित हुआ है।

राहुल जी का यह मत भी विद्वानों द्वारा मान्य नहीं है। क्योंकि इस नामकरण से लौकिक रस का उल्लेख करनेवाली किसी विशेष रचना का प्रमाण नहीं मिलता। नाथपंथी तथा हठयोगी कवियों तथा खुसरो आदि की काव्य-प्रवृत्तियों का इस नाम में समावेश नहीं होता है।

 आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के द्वारा जो नाम सुझाया गया उसकी भी बात हो जाये

*  आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का मत

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी- उन्होंने हिंदी साहित्य के प्रथम काल का नाम बीज-बपन काल रखा। उनका यह नाम योग्य नहीं है क्योंकि साहित्यिक प्रवृत्तियों की दृष्टि से यह काल आदिकाल नहीं है। यह काल तो पूर्ववर्ती परिनिष्ठित अपभ्रंश की साहित्यिक प्रवृत्तियों का विकास है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के मतानुसार क्या नाम दिया गया है

*  आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी- इन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक काल को आदिकाल नाम दिया है। विद्वान भी इस नाम को अधिक उपयुक्त मानते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा है- वस्तुतः हिंदी का आदि काल शब्द एक प्रकार की भ्रामक धारणा की सृष्टि करता है और श्रोता के चित्त में यह भाव पैदा करता है कि यह काल कोई आदिम, मनोभावापन्न, परंपराविनिर्मुक्त, काव्य-रूढि़यों से अछूते साहित्य का काल है। यह ठीक वहीं है। यह काल बहुत अधिक परंपरा-प्रेमी, रूढि़ग्रस्त, सजग और सचेत कवियों का काल है। आदिकाल नाम ही अधिक योग्य है क्योंकि साहित्य की दृष्टि से यह काल अपभ्रंश काल का विकास ही है, पर भाषा की दृष्टि से यह परिनिष्ठित अपभ्रंश से आगे बढ़ी हुई भाषा की सूचना देता है।

नाम निर्णय – वह कौन सा नाम है जो सर्वथा उचित और मान्य है ?

*  नाम निर्णय

इस प्रकार हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रथम काल के नामकरण के रूप में आदिकाल नाम ही योग्य व सार्थक है, क्योंकि इस नाम से उस व्यापक पुष्ठभूमि का बोध होता है, जिस पर परवर्ती साहित्य खड़ा है। भाषा की दृष्टि से इस काल के साहित्य में हिंदी के प्रारंभिक रूप का पता चलता है तो भाव की दृष्टि से भक्तिकाल से लेकर आधुनिक काल तक की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों के आदिम बीज इसमें खोजे जा सकते हैं। इस काल की रचना-शैलियों के मुख्य रूप इसके बाद के कालों में मिलते हैं। आदिकाल की आध्यात्मिक, श्रृंगारिक तथा वीरता की प्रवृत्तियों का ही विकसित रूप परवर्ती साहित्य में मिलता है। इस कारण आदिकाल नाम ही अधिक उपयुक्त तथा व्यापक नाम है।

सन्दर्भ : IGNOU MA (हिंदी) की पाठ्य सामग्री और विकिपीडिया पर दिया हिंदी साहित्य का इतिहास 

आदिकाल से सम्बंधित कुछ अन्य लेख 

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वीरगाथा साहित्य
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