जैन साहित्य की रचनायें


आदिकाल (१००० ईस्वी से १३०० ईस्वी का काल) हिंदी साहित्य का आदिकाल कहा जाता है. जैन मुनियों द्वारा लिखा गया साहित्य “जैन साहित्य” के नाम से जाना जाता है. इसपर विस्तार से बात करते हैं

भारत के पश्चिमीभाग मे जैन साधुओ ने अपने मत का प्रचार हिन्दी कविता के माध्यम से किया । इन्होंने“रास” को एक प्रभाव्शाली रचनाशैली का रूप दिया । जैन तीर्थंकरो के जीवन चरित तथावैष्णव अवतारों की कथायें जैन-आदर्शो के आवरण मे ‘रास‘ नाम से पद्यबद्ध की गयी ।अतः जैन साहित्य का सबसे प्रभावशाली रूप ‘रास‘ ग्रंथ बन गये । वीरगाथाओं मे रास कोही रासो कहा गया किन्तु उनकी विषय भूमि जैन ग्रंथो से भिन्न हो गई । हिन्दी जैन साहित्य की कुछ प्रमुख रचनायें इस प्रकार है–

उपदेशरसायन रास- यह अपभ्रंश की रचना है एवं गुर्जर प्रदेश में लिखी गई हैं।इसके रचयिता श्री जिनदत्त सूरि हैं।

भरतेश्वरबाहुबलि रास- शालिभद्र सूरि द्वारा लिखित है। कृति में रचनाकाल सं. १२३१वि.दिया हुआ है। इसमें जैन तीर्थकरॠषभदेव के पुत्रोंभरतेश्वर औरबाहुबलि में राजगद्दी के लिए हुए संघर्ष का वण्रनहै।

बुद्धिरास‘ यह सं. १२४१ के आसपास की रचना है। इसके रचयित शालिभद्रसूरिहैं।

जीवदयारास-यह रचना जालोर पश्चिमी राजस्थान की है। इसके रचयिता कवि आसगु हैं।

चन्दरवाला रास- आसगु की रचना है। यह भी १२५७वि. के आसपास की रचना है।

नेमिनाथरास- इसके रचयिता सुमति गण माने जाते हैं।

गयसुकमाल रास- अनुमानतःइसकी रचना तिथि लगभग सं. १३०० वि. मानी गई है। इसके रचनाकार देल्हणिहै।

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