भक्तिकालीन राजनैतिक परिस्थितियाँ


भक्ति काल की शुरुवात 1243 के आसपास से मानी जाती है – ऐतिहासिक तौर पर 1206 से 1526 तक का काल दिल्ली सल्तनत का काल माना जाता है. इतने छोटे से काल में मम्लूक वंश (1206 से 1290 ), खिलजी वंश (1290 -1320 ), तुगलक वंश (1320 -1414 ), सैयाद वंश (1414–51), लोधी वंश (1451–1526) का शासन रहा. भक्तिकाल 1643 तक माना जाता है. 1526 से मुग़ल साम्राज्य की शुरुवात मानी जाती है

कबीर (1440  – 1518 ), जायसी (), रविदास (देहत्याग 1540 ), गुरु नानक (1469 – 1539 ), तुलसीदास (1532 – 1623 ), सूरदास (1478 – १५७३) का काल सचमुच ही संक्रांति का काल रहा होगा

तत्कालीन राजनीतिक वातावरण पूर्ण रुप से विषाक्त होगा । हिंदू- मुसलमानों के भीतर भी निरंतर ईर्ष्या और द्वेष का बोलबाला रहा होगा। तत्कालीन समृद्ध धर्मों बौद्ध, जैन, शैव एवं वैष्णवों के अंदर विभिन्न प्रकार की शाखाएँ निकल रही थी । सभी धर्मों के ठेकेदार आपस में लड़ने एवं झगड़ने में व्यस्त थे।लोदी वंश का सर्वाधिक यशस्वी सुल्तान, सिकंदर शाह सन् १४८९ ई. में गद्दी पर बैठा। सिकंदर को घरेलू परिस्थिति एवं कट्टर मुसलमानों का कड़ा विरोध सहना पड़ा। दुहरे विरोध के कारण वह अत्यंत असहिष्णु हो उठा था।

दूसरी तरफ भक्ति की जो धारा सातवीं शताब्दी में भारत के दक्षिण में शुरू हुई वह धीरे धीरे पूर्वी भाग मे फैलने लगी. आलवार बंधु नाम से कई प्रख्यात भक्त हुए हैं। इनमें से कई तथाकथित नीची जातियों के भी थे। वे बहुत पढे-लिखे नहीं थे, परंतु अनुभवी थे। आलवारों के पश्चात दक्षिण में आचार्यों की एक परंपरा चली जिसमें रामानुजाचार्य प्रमुख थे।

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