लघुकथा ४ : दारू, दोस्त और शाम


लघुकथा ४ :
“देखो भाई जब अर्थव्यवस्था प्रगति पर होती है तो कमोबेश सभी आदमी दुबली पतली औरतों को पसंद करने लगते हैं; लेकिन जब अर्थव्यवस्था बुरे समय से गुजर रही हो तो कमोबेश सभी आदमी ” size doesnt matter ” के सिद्धांत का पालन करने लगते हैं” एक ने कहा

“सही बात भाई, देखो ६०-७० के दशक की फिल्मों को; सभी हेरोइने माशाल्लाह खाते पीते घर की लगती थीं… और हमारी अर्थव्यवस्था लचर स्थिति में थी , और फिर ९० के बाद से अर्थव्यवस्था सुधरी हीरोइन भी” दूसरा बोला

“भाई ऐसा है जब आदमी भूखा हो और चारों तरफ भुकमरी तो वापस ” original food ” पर लौट आता है” तीसरा बोला

“अच्छा तुम्हे पता है अफ्रीका में माना जाता है की औरत “extra energy ” को अपने नितम्भों मे स्टोर कर लेती है; यार बात तो सही है ६०-७० की हीरोइन के ही ले लो ” चौथा बोला

“अबे सुनो असली थ्योरी – अर्थव्यवस्था सही है तो औरत फैशनेबुल और पतली होती है और जब अर्थव्यवस्था लचर होती है तो कुछ औरतें मोटी हो जाती हैं क्योंकि उनके लिए यही तरीका होता है बताने का की उनके पास खाने की कमी नहीं है” पांचवा बोला

सही है, यह सही है, इस तर्क में जान है कहते हुए पाँचों ने शाम का चौथा पेग उठाया …..

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