वो वाकया

7

(१)

बस दो ही तो लोग जानते थे की आखिर हुआ क्या था. और दो मे से एक तो निर्मल खुद ही था. फिलहाल वो परेशान इसलिए था की अभी तो वो खुद के ही सवालों से जूझ रहा था. दिन भी कितने हुए थे उस घटना को. मुश्किल से ३. लेकिन स्वयं के ही सवालों का जवाब देते-देते उसका मस्तिष्क थकने लगा था. उसकी परिकल्पना थी के जैसे-जैसे दिन बीतेंगे वैसे-वैसे उसकी यह बेचैनी कम होने लगेगी; बशर्ते वो जो दूसरा चश्मदीद है उस वाकिये का जिक्र कहीं जया से न कर दे. अगर दूसरा चश्मदीद चुप रहा तो फिर कुछ दिन बाद बात रफा दफा हो जाएगी – मन का डर भी जाता रहेगा; सब शांत हो जायेगा

 

इसीलिए वह पिछले ३ दिनों से “दूसरे” के आसपास भी नहीं फटक रहा था.ऐसा नहीं था की घटना से पहले उसकी “दूसरे” से रोज बात हुआ करती थी लेकिन पिछले ३ दिनों में उसने विशेष ध्यान रखा था की दोनों का आमना सामना न हो. दोनों का घर ९० डिग्री के कोण पर जुड़ा हुआ था. जैसे घर की चारदीवारी मे हर दिवार दूसरी दीवार से ९० डिग्री के कोण पर जुडी होती है; ठीक वैसे दोनों के घर के दरवाजे ९० डिग्री के कोण पर मिलते थे. दोनों का चार मंजिला मकान; एक की बॉलकनी से दूसरे के कमरे साफ़ नज़र आते थे. दोपहर के आसपास दोनों घर की औरतें, बॉलकनी मे बैठे एक दूसरे से बतियाती रहतीं थीं. ऐसे में उसका, दूसरे चश्मदीद से ३ दिन तक आमना सामना न होना बिना विशेष प्रयास के संभव भी नहीं था.

(२)

निर्मल ने करवट बदल माथे पर उभर आये हलके से पसीने को पोंछा, मगर उसको समझ नहीं आया की “ऐ सी” कमरे में उसको पसीना क्यों आ रहा था?; पसीना था भी या जो उसके दिमाग में लगातार विचार चल रहे थे उसको हटाने की विफल कोशिश मे उसके हाथ माथे पर चले गए थे. चंद पलों बाद उसने फिर करवट ली, फिर माथे पर हाथ फेरा. पहले तो उसको लगा की पिछले ३ दिनों से जिस डर मे वो जी रहा है वो डर अब उसके लिए असहनीय होता जा रहा है. कब, किससे और क्या बात करे वह? बात करने लायक बात भी तो हो! शायद इसी डर के चलते उसको पसीना आ रहा था. फिर लगा शायद डर नहीं बल्कि एक भीषण ग्लानि है जिसने पिछले तीन दिनों से रात की अँधेरे में आत्मभर्त्सना का अहसास इतना तीव्र कर दिया है की अब उसको स्वयं से भी आँख मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही – उसे लगा वो रो पड़ेगा.

एक बार फिर निर्मल ने उस वाकये को परे झटकना चाहा मगर उतने ही पैनेपन से वही घटना आँखों के सामने नमूदार हो गयी। बेचैनी इतनी की नींद का सवाल ही नहीं और घुटन ऐसी जबरदस्त कि लगे उठकर कहीं चला जाए. निर्मल ने उठकर पानी पिया, और कुछ कदम चलकर खिड़की की पास जाकर खड़ा हो गया. “ऐ सी” के चलने से खिड़की मे कम्पन पैदा होता था. कमरे मे २ और लोग सो रहे थे; चैन से; एक जया – उसकी पत्नी और दूसरी उसकी छोटी बेटी.

उसकी घुटन जून की गर्मी की घुटन नहीं थी. रात को वो खिड़की के आगे लटके परदों को क्लिप्स की मदद से खिड़की के जाली में अटका दिया करता था; वर्ना “ऐ सी” की हवा से परदे उड़ते रहते थे. उड़ते पर्दो के झिरियों से बहार खड़े व्यक्ति को रोशन कमरे के अंदर का दृश्य साफ़ दिखाई दिया करता था; इसलिए भी इस सावधानी की जरूरत थी. निर्मल की पत्नी रात सोने से पहले अनिवार्यतः यह ध्यान रखा करती थी की परदों पर चिटकनी लगी है या नहीं

निर्मल ने परदे को बहुत थोड़ा सा खोलकर बाहर झाँका. ९० डिग्री की कोण पर खड़े “दूसरे” के मकान की बत्तियां बंद थीं. उसने घडी पर नज़र दौड़ाई; रात के २ बजे थे. पीछे का दरवाजा खोल वो बाथरूम गया, फिर ड्राइंग रूम मे चक्कर काटने लगा.

यह तीसरी रात थी; उस वाकिये के बाद; की उसको नींद नहीं आ रही थी. नींद लगती भी तो उचट जाती, आँख खुलती तो वो पाता की दिल की धड़कन बढ़ी हुई है. वो कब ड्राइंग रूम से वापस अपने रूम मे आया, कितनी देर लगी उसको नींद लगने में उसे नहीं पता, लेकिन सुबह ५ बजे वो फिर अधूरी नींद से जग गया. उसके बाद नींद नहीं लगी.

दफ्तर निकलने से पहले उसने एक बार पर्दा सरकाकर नज़र मार ली की कहीं उस वाकिये की चश्मदीद पड़ोसन बहार बालकनी मे तो नहीं है. वो नहीं चाहता था उन दोनों का आमना सामना हो. किसी को बाहर न देख वो चुपके से ऑफिस के लिए निकल गया

(३)

शाम जब वो घर लौटा तो जया किचन मे व्यस्त थी. अमूमन जया, निर्मल के घर लौटने पर ५-१० मिनट के लिए ही सही, सब काम रोककर उसके पास जरूर बैठती थी – कुछ निर्मल की सुनने की दिन कैसा रहा, कुछ निर्मल को सुनाने की दिन कैसा रहा. निर्मल को पता था जिस दिन जया अपने इस नित्यकर्म को नहीं निभाती समझो उस दिन उसका मूड ठीक नहीं है. आज जया ने अपना काम जारी रखा. उसने जया के पास जाकर “हेलो” कहा, जया ने भी बिना पलटे कढ़छी चलाते हुए जवाब दिया, “हम्म …पानी ले लो” निर्मल को यह खटका, कहीं उसके पीछे, दिन में, पड़ोसी से कुछ बात तो नहीं हुई होगी जया की? और अगर उसने जया को बता दिया हुआ तो?

क्या हुआ? मूड ठीक नहीं है क्या आज… निर्मल चाहता तो था की पूछे लेकिन उसको जया के मूड का पता था. अगर उसको सब पता चल गया है, तब तो उसको अभी छेड़ना ठीक नहीं – की कहीं वो फूट पड़ी तो फिर न बच्चों के वहां होने की परवाह करेगी न माँ पापा के वहां होने का लिहाज. रात का खाना नहीं खायेगा कहकर निर्मल सीधा अपने फ्लोर पर आ गया.

जया को काम समेटकर ऊपर आने में समय लगा. इस बीच निर्मल इसी उधेड़बुन में रहा की जया को पता चल गया है या नहीं, अगर उसको पता होता तो माँ को भी पता होता – माँ से तो वो सब बात कर लेती है, लेकिन माँ के मूड से तो नहीं लगा की कोई बात हुई है!, इतनी तो कुछ बात भी नहीं है की जिसको लेकर पडोसी कोई बतंगड़ मचाये – और फिर उसने कुछ कहना ही होता तो आज ३ दिन हो गए उस वाकये को, कहना होता तो कह दिया होता अबतक. खिड़की के पास जाकर एक बार धीरे से पर्दा हटाकर “दूसरे” के घर झाँका. परदे डले हुए थे; बत्तियां जल रही थीं.

जया के ऊपर आने से पहले, छोटी लड़की ऊपर आयी. निर्मल ने बातों बातों मे उससे पुछा, “और क्या किया दिन भर? कोई आया था आज घर पर?” छुटकी पहले सवाल को केंद्र मे रखकर जवाब दे रही थी, बिलकुल वैसे ही जैसे वो रोज निर्मल से सोने से पहले बातें करती है; निर्मल ने एक बार फिर घुमाकर वही सवाल किया की पता तो चले कौन कौन आया था घर. “न कोई नहीं” छुटकी के जवाब के बाद भी उसका संदेह की शायद जया को सब पता चल गया है; बना रहा. क्या पता दोपहर में जब छुटकी सोई हो तब उसका आना हुआ हो. और फिर बहार भी तो मिल सकती है; जया शाम को सामने वाले पार्क में बच्चों के साथ तो जाती ही है.

(४)

“खाना क्यों नहीं खाया आज…इतनी मेहनत से करेले छोंके थे, तुझे तो पसंद हैं; फिर क्यों नहीं खाया? इसी सब मे आज शाम तेरे आने पर २ मिनट बैठ भी न पायी तेरे पास.. और ऊपर क्यों चले आये? क्या? कुछ खाया था क्या आज ऑफिस से निकलकर?………”

निर्मल को शाम से शायद पहली बार आराम की सांस आयी. जया की बात का जवाब देने के साथ साथ वो खुद से भी बातें कर रहा था. ‘बेकार का खटका था मन में. अब तो ४ दिन हो गए; अब नहीं लगता की पड़ोसन उस वाकिये के बारे में कुछ बोलेगी. कहना होता तो कह चुकी होती. और फिर बात भी क्या है? उसकी कुछ गलती भी नहीं, वो तो उस दिन परदे के पास वैसे ही खड़ा था. सुबह का समय था, ऑफिस जाने से पहले एक चाय पिया करता है; बस उसी की चुस्कियां ले रहा था की पड़ोसन की बड़ी लड़की बाथरूम से निकली और बगल के कमरे मे दाखिल हुई. बाहर की तस्वीर में अकस्मात् बदलाव हुआ तो आंखें स्वतः ही उस तरफ खिंच गयीं; वो किसी इरादे से तो खिड़की पर खड़ा नहीं था. उसे क्या पता था की लड़की कमरे में कपडे बदल रही थी.’

पल भर भी बहुत ज्यादा रहा होगा, निर्मल की नज़र पड़ी और पल भर मे ही झटके से उसने नज़र हटा ली. लगा जैसे तस्वीर मे फिर परिवर्तन हुआ है कि कोई उसे देख रहा है. जैसे ही उसने नज़र हटाई, उसकी नज़र पड़ोसन पर पड़ी जो बालकनी में अपनी लड़की का गिला तौलिया डालने निकली थी. उसी एक पल के छोटे से अंतराल में शायद पड़ोसन की आँखे निर्मल पर टीकी. अब जो निर्मल और पड़ोसन की नज़रें टकरायीं तो निर्मल को लगा पड़ोसन कुछ गलत समझ बैठी है. पल भर के अंदर क्या हुआ शायद किसी को भी ठीक से समझ नहीं आया. पड़ोसन के चेहरे पर जो भाव निर्मल ने देखा शायद वो बद्तमीज, निर्लज, कमीना, ओहहो, अरे-अरे की खिचड़ी रहा होगा. वो भाग कर कमरे मे दाखिल हुई और खिड़की पर परदे खींच दिए – शायद कुछ बोली भी लेकिन उससे भी अधिक तीजी से निर्मल खिड़की से हट गया; उसने सुना नहीं कि वो क्या बोली

(६)

खिड़की से खटाक से हटने के बाद निर्मल की हिम्मत ही नहीं हुई की वो वापस बालकनी या खिड़की की तरफ जाये. सबकुछ इतनी जल्दी से हुआ की कौन क्या समझा इसका सही सही अनुमान लगाना निर्मल के लिए भी मुमकिन नहीं था. निर्मल इसी आत्मग्लानि मे रहा की क्यों उसकी नज़र उस कमरे की तरफ गयी. और गयी भी तो वो वहां से हट क्यों नहीं गया. पल-दो पल को ही सही, उसने क्यों कमरे मे देखा. पड़ोसन ने क्या सोचा होगा उसके बारे में? जितने गुस्से से वो मुड़ी थी जरूर गलत ही समझा होगा. कहीं उसको यह तो नहीं लगा, की मैं वहां जानबुझ कर खड़ा था? और उसके बाद से आज तक, ४ दिन बाद तक, वो इसी उलझन मे है की करे तो क्या करे