तुलसीदास : परिचय

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जन्म काल

महान कवि तुलसीदास की प्रतिभा-किरणों से न केवल हिन्दू समाज और भारत, बल्कि समस्त संसार आलोकित हो रहा है। बड़ा अफसोस है कि उसी कवि का जन्म-काल विवादों के अंधकार में पड़ा हुआ है। अब तक प्राप्त शोध-निष्कर्ष भी हमें निश्चितता प्रदान करने में असमर्थ दिखाई देते हैं। मूलगोसाईं-चरित के तथ्यों के आधार पर डा० पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल और श्यामसुंदर दास तथा किसी जनश्रुति के आधार पर “मानसमयंक’ – कार भी १५५४ का ही समर्थन करते हैं। इसके पक्ष में मूल गोसाईं-चरित की निम्नांकित पंक्तियों का विशेष उल्लेख किया जाता है।

पंद्रह सै चौवन विषै, कालिंदी के तीर,
सावन सुक्ला सत्तमी, तुलसी धरेउ शरीर ।

तुलसीदास की जन्मभूमि
तुलसीदास की जन्मभूमि होने का गौरव पाने के लिए अब तक राजापुर (बांदा), सोरों (एटा), हाजीपुर (चित्रकूट के निकट), तथा तारी की ओर से प्रयास किए गए हैं। संत तुलसी साहिब के आत्मोल्लेखों, राजापुर के सरयूपारीण ब्राह्मणों को प्राप्त “मुआफी’ आदि बहिर्साक्ष्यों और अयोध्याकांड (मानस) के तायस प्रसंग, भगवान राम के वन गमन के क्रम में यमुना नदी से आगे बढ़ने पर व्यक्त कवि का भावावेश आदि अंतर्साक्ष्यों तथा तुलसी-साहित्य की भाषिक वृत्तियों के आधार पर रामबहोरे शुक्ल राजापुर को तुलसी की जन्मभूमि होना प्रमाणित हुआ है।
रामनरेश त्रिपाठी का निष्कर्ष है कि तुलसीदास का जन्म स्थान सोरों ही है। सोरों में तुलसीदास के स्थान का अवशेष, तुलसीदास के भाई नंददास के उत्तराधिकारी नरसिंह जी का मंदिर और वहां उनके उत्तराधिकारियों की विद्यमानता से त्रिपाठी और गुप्त जी के मत को परिपुष्ट करते हैं।

जाति एवं वंश
जाति और वंश के सम्बन्ध में तुलसीदास ने कुछ स्पष्ट नहीं लिखा है। कवितावली एवं विनयपत्रिका में कुछ पंक्तियां मिलती हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि वे ब्राह्मण कुलोत्पन्न थे-
दियो सुकुल जनम सरीर सुदर हेतु जो फल चारि को
जो पाइ पंडित परम पद पावत पुरारि मुरारि को ।
(विनयपत्रिका)
भागीरथी जलपान करौं अरु नाम द्वेै राम के लेत नितै हों ।
मोको न लेनो न देनो कछु कलि भूलि न रावरी और चितैहौ ।।जानि के जोर करौं परिनाम तुम्हैं पछितैहौं पै मैं न भितैहैं
बाह्मण ज्यों उंगिल्यो उरगारि हौं त्यों ही तिहारे हिए न हितै हौं।
जाति-पांति का प्रश्न उठने पर वह चिढ़ गये हैं। कवितावली की निम्नांकित पंक्तियों में उनके अंतर का आक्रोश व्यक्त हुआ है –
“”धूत कहौ अवधूत कहौ रजपूत कहौ जोलहा कहौ कोऊ काहू की बेटी सों बेटा न व्याहब,
काहू की जाति बिगारी न सोऊ।”
“”मेरे जाति-पांति न चहौं काहू का जाति-पांति,
मेरे कोऊ काम को न मैं काहू के काम को ।”
राजापुर से प्राप्त तथ्यों के अनुसार भी वे सरयूपारीण थे। तुलसी साहिब के आत्मोल्लेख एवं मिश्र बंधुओं के अनुसार वे कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। जबकि सोरों से प्राप्त तथ्य उन्हें सना ब्राह्मण प्रमाणित करते है, लेकिन “दियो सुकुल जनम सरीर सुंदर हेतु जो फल चारि को’ के आधार पर उन्हें शुक्ल ब्राह्मण कहा जाता है। परंतु शिवसिंह “सरोज’ के अनुसार सरबरिया ब्राह्मण थे।ब्राह्मण वंश में उत्पन्न होने के कारण कवि ने अपने विषय में “जायो कुल मंगन’ लिखा है। तुलसीदास का जन्म अर्थहीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जिसके पास जीविका का कोई ठोस आधार और साधन नहीं था। माता-पिता की स्नेहिल छाया भी सर पर से उठ जाने के बाद भिक्षाटन के लिए उन्हें विवश होना पड़ा।

माता–पिता
तुलसीदास के माता पिता के संबंध में कोई ठोस जानकारी नहीं है। प्राप्त सामग्रियों और प्रमाणों के अनुसार उनके पिता का नाम आत्माराम दूबे था। किन्तु भविष्यपुराण में उनके पिता का नाम श्रीधर बताया गया है। रहीम के दोहे के आधार पर माता का नाम हुलसी बताया जाता है।
सुरतिय नरतिय नागतिय, सब चाहत अस होय ।
गोद लिए हुलसी फिरैं, तुलसी सों सुत होय ।।

गुरु
तुलसीदास के गुरु के रुप में कई व्यक्तियों के नाम लिए जाते हैं। भविष्यपुराण के अनुसार राघवानंद, विलसन के अनुसार जगन्नाथ दास, सोरों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार नरसिंह चौधरी तथा ग्रियर्सन एवं अंतर्साक्ष्य के अनुसार नरहरि तुलसीदास के गुरु थे। राघवनंद के एवं जगन्नाथ दास गुरु होने की असंभवता सिद्ध हो चुकी है। वैष्णव संप्रदाय की किसी उपलब्ध सूची के आधार पर ग्रियर्सन द्वारा दी गई सूची में, जिसका उल्लेख राघवनंद तुलसीदास से आठ पीढ़ी पहले ही पड़ते हैं। ऐसी परिस्थिति में राघवानंद को तुलसीदास का गुरु नहीं माना जा सकता।
सोरों से प्राप्त सामग्रियों के अनुसार नरसिंह चौधरी तुलसीदास के गुरु थे। सोरों में नरसिंह जी के मंदिर तथा उनके वंशजों की विद्यमानता से यह पक्ष संपुष्ट हैं। लेकिन महात्मा बेनी माधव दास के “मूल गोसाईं-चरित’ के अनुसार हमारे कवि के गुरु का नाम नरहरि है।

बाल्यकाल और आर्थिक स्थिति
तुलसीदास के जीवन पर प्रकाश डालने वाले बहिर्साक्ष्यों से उनके माता-पिता की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर प्रकाश नहीं पड़ता। केवल “मूल गोसाईं-चरित’ की एक घटना से उनकी चिंत्य आर्थिक स्थिति पर क्षीण प्रकाश पड़ता है। उनका यज्ञोपवीत कुछ ब्राह्मणों ने सरयू के तट पर कर दिया था। उस उल्लेख से यह प्रतीत होता है कि किसी सामाजिक और जातीय विवशता या कर्तव्य-बोध से प्रेरित होकर बालक तुलसी का उपनयन
जाति वालों ने कर दिया था।
तुलसीदास का बाल्यकाल घोर अर्थ-दारिद्रय में बीता। भिक्षोपजीवी परिवार में उत्पन्न होने के कारण बालक तुलसीदास को भी वही साधन अंगीकृत करना पड़ा। कठिन अर्थ-संकट से गुजरते हुए परिवार में नये सदस्यों का आगमन हर्षजनक नहीं माना गया –
जायो कुल मंगन बधावनो बजायो सुनि,
भयो परिताप पाय जननी जनक को ।
बारें ते ललात बिललात द्वार-द्वार दीन,
जानत हौं चारि फल चारि ही चनक को ।
(कवितावली)
मातु पिता जग जाय तज्यो विधि हू न लिखी कछु भाल भलाई ।
नीच निरादर भाजन कादर कूकर टूकनि लागि ललाई ।
राम सुभाउ सुन्यो तुलसी प्रभु, सो कह्यो बारक पेट खलाई ।
स्वारथ को परमारथ को रघुनाथ सो साहब खोरि न लाई ।।
होश संभालने के पुर्व ही जिसके सर पर से माता – पिता के वात्सल्य और संरक्षण की छाया सदा -सर्वदा के लिए हट गयी, होश संभालते ही जिसे एक मुट्ठी अन्न के लिए द्वार-द्वार विललाने को बाध्य होना पड़ा, संकट-काल उपस्थित देखकर जिसके स्वजन-परिजन दर किनार हो गए, चार मुट्ठी चने भी जिसके लिए जीवन के चरम प्राप्य (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) बन गए, वह कैसे समझे कि विधाता ने उसके भाल में भी भलाई के कुछ शब्द लिखे हैं। उक्त पदों में व्यंजित वेदना का सही अनुभव तो उसे ही हो सकता है, जिसे उस दारुण परिस्थिति से गुजरना पड़ा हो। ऐसा ही एक पद विनयपत्रिका में भी मिलता है –
द्वार-द्वार दीनता कही काढि रद परिपा हूं
हे दयालु, दुनी दस दिसा दुख-दोस-दलन-छम कियो संभाषन का हूं ।
तनु जन्यो कुटिल कोट ज्यों तज्यों मातु-पिता हूं ।
काहे को रोष-दोष काहि धौं मेरे ही अभाग मो सी सकुचत छुइ सब छाहूं ।
(विनयपत्रिका, २७५)

तुलसीदास के जीवन की कुछ घटनाएं एवं तिथियां भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। कवि के जीवन-वृत्त और महिमामय व्यक्तित्व पर उनसे प्रकाश पड़ता है।
यज्ञोपवीत
मूल गोसाईं चरित के अनुसार तुलसीदास का यज्ञोपवीत माघ शुक्ला पंचमी सं० १५६१ में हुआ –
पन्द्रह सै इकसठ माघसुदी। तिथि पंचमि औ भृगुवार उदी ।
सरजू तट विप्रन जग्य किए। द्विज बालक कहं उपबीत किए ।।
कवि के माता – पिता की मृत्यु कवि के बाल्यकाल में ही हो गई थी।

विवाह
जनश्रुतियों एवं रामायणियों के विश्वास के अनुसार तुलसीदास विरक्त होने के पूर्व भी कथा-वाचन करते थे। युवक कथावाचक की विलक्षण प्रतिभा और दिव्य भगवद्भक्ति से प्रभावित होकर रत्नावली के पिता पं० दीन बंधु पाठक ने एक दिन, कथा के अन्त में, श्रोताओं के विदा हो जाने पर, अपनी बारह वर्षीया कन्या उसके चरणों में सौंप दी। मूल गोसाईं चरित के अनुसार रत्नावली के साथ युवक तुलसी का यह वैवाहिक सूत्र सं० १५८३ की ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी, दिन गुरुवार को जुड़ा था –
पंद्रह सै पार तिरासी विषै ।
सुभ जेठ सुदी गुरु तेरसि पै ।
अधिराति लगै जु फिरै भंवरी ।
दुलहा दुलही की परी पंवरी ।।

आराध्य–दर्शन
भक्त शिरोमणि तुलसीदास को अपने आराध्य के दर्शन भी हुए थे। उनके जीवन के वे सर्वोत्तम और महत्तम क्षण रहे होंगे। लोक-श्रुतियों के अनुसार तुलसीदास को आराध्य के दर्शन चित्रकूट में हुए थे। आराध्य युगल राम – लक्ष्मण को उन्होंने तिलक भी लगाया था –
चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर ।
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर ।।
मूल गोसाईं चरित के अनुसार कवि के जीवन की वह पवित्रतम तिथि माघ अमावस्या (बुधवार), सं० १६०७ को बताया गया है।
सुखद अमावस मौनिया, बुध सोरह सै सात ।
जा बैठे तिसु घाट पै, विरही होतहि प्रात ।।
गोस्वामी तुलसीदास के महिमान्वित व्यक्तित्व और गरिमान्वित साधना को ज्योतित करने वाली एक और घटना का उल्लेख मूल गोसाईं चरित में किया गया है। तुलसीदास नंददास से मिलने बृंदावन पहुंचे। नंददास उन्हें कृष्ण मंदिर में ले गए। तुलसीदास अपने आराध्य के अनन्य भक्त थे। तुलसीदास राम और कृष्ण की तात्त्विक एकता स्वीकार करते हुए भी राम-रुप श्यामघन पर मोहित होने वाले चातक थे। अतः घनश्याम कृष्ण के समक्ष नतमस्तक कैसे होते। उनका भाव-विभोर कवि का कण्ठ मुखर हो उठा –
कहा कहौं छवि आज की, भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तब नवै, जब धनुष बान लो हाथ ।।
इतिहास साक्षी दे या नहीं द, किन्तु लोक-श्रुति साक्षी देती है कि कृष्ण की मूर्ति राम की मूर्ति में बदल गई थी।

रत्नावली का महाप्रस्थान
रत्नावली का बैकुंठगमन ‘मूल गोसाईं चरित’ के अनुसार सं० १५८९ में हुआ। किंतु राजापुर की सामग्रियों से उसके दीर्घ जीवन का समर्थन होता है।

मीराबाई का पत्र
महात्मा बेनी माधव दास ने मूल गोसाईं चरित में मीराबाई और तुलसीदास के पत्राचार का उल्लेख किया किया है। अपने परिवार वालों से तंग आकर मीराबाई ने तुलसीदास को पत्र लिखा। मीराबाई पत्र के द्वारा तुलसीदास से दीक्षा ग्रहण करनी चाही थी। मीरा के पत्र के उत्तर में विनयपत्रिका का निम्नांकित पद की रचना की गई।
जाके प्रिय न राम वैदेही
तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ।
सो छोड़िये
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी ।
बलिगुरु तज्यो कंत ब्रजबनितन्हि, भये मुद मंगलकारी ।
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहां लौं ।
अंजन कहां आंखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहां लौं ।
तुलसी सो सब भांति परमहित पूज्य प्रान ते प्यारो ।
जासों हाय सनेह राम-पद, एतोमतो हमारो ।।
तुलसीदास ने मीराबाई को भक्ति-पथ के बाधकों के परित्याग का परामर्श दिया था।

केशवदास से संबद्ध घटना
मूल गोसाईं चरित के अनुसार केशवदास गोस्वामी तुलसीदास से मिलने काशी आए थे। उचित सम्मान न पा सकने के कारण वे लौट गए।

अकबर के दरबार में बंदी बनाया जाना
तुलसीदास की ख्याति से अभिभूत होकर अकबर ने तुलसीदास को अपने दरबार में बुलाया और कोई चमत्कार प्रदर्शित करने को कहा। यह प्रदर्शन-प्रियता तुलसीदास की प्रकृति और प्रवृत्ति के प्रतिकूल थी, अतः ऐसा करने से उन्होंने इनकार कर दिया। इस पर अकबर ने उन्हें बंदी बना लिया। तदुपरांत राजधानी और राजमहल में बंदरों का अभूतपूर्व एवं अद्भुत उपद्रव शुरु हो गया। अकबर को बताया गया कि यह हनुमान जी का क्रोध है। अकबर को विवश होकर तुलसीदास को मुक्त कर देना पड़ा।

जहांगीर को तुलसी–दर्शन
जिस समय वे अनेक विरोधों का सामना कर सफलताओं और उपलब्धियों के सर्वोच्च शिखर का स्पर्श कर रहे थे, उसी समय दर्शनार्थ जहांगीर के आने का उल्लेख किया गया मिलता है।

दांपत्य जीवन
सुखद दांपत्य जीवन का आधार अर्थ प्राचुर्य नहीं, पति -पत्नि का पारस्परिक प्रेम, विश्वास और सहयोग होता है। तुलसीदास का दांपत्य जीवन आर्थिक विपन्नता के बावजूद संतुष्ट और सुखी था। भक्तमाल के प्रियादास की टीका से पता चलता है कि जीवन के वसंत काल में तुलसी पत्नी के प्रेम में सराबोर थे। पत्नी का वियोग उनके लिए असह्य था। उनकी पत्नी-निष्ठा दिव्यता को उल्लंघित कर वासना और आसक्ति की ओर उन्मुख हो गई थी।
रत्नावली के मायके चले जाने पर शव के सहारे नदी को पार करना और सपं के सहारे दीवाल को लांघकर अपने पत्नी के निकट पहुंचना। पत्नी की फटकार ने भोगी को जोगी, आसक्त को अनासक्त, गृहस्थ को सन्यासी और भांग को भी तुलसीदल बना दिया। वासना और आसक्ति के चरम सीमा पर आते ही उन्हें दूसरा लोक दिखाई पड़ने लगा। इसी लोक में उन्हें मानस और विनयपत्रिका जैसी उत्कृष्टतम रचनाओं की प्रेरणा और सिसृक्षा मिली।

वैराग्य की प्रेरणा
तुलसीदास के वैराग्य ग्रहण करने के दो कारण हो सकते हैं। प्रथम, अतिशय आसक्ति और वासना की प्रतिक्रिया ओर दूसरा, आर्थिक विपन्नता। पत्नी की फटकार ने उनके मन के समस्त विकारों को दूर कर दिया। दूसरे कारण विनयपत्रिका के निम्नांकित पदांशों से प्रतीत होता है कि आर्थिक संकटों से परेशान तुलसीदास को देखकर सन्तों ने भगवान राम की शरण में जाने का परामर्श दिया –
दुखित देखि संतन कह्यो, सोचै जनि मन मोहूं
तो से पसु पातकी परिहरे न सरन गए रघुबर ओर निबाहूं ।।तुलसी तिहारो भये भयो सुखी प्रीति-प्रतीति विनाहू ।
नाम की महिमा, सीलनाथ को, मेरो भलो बिलोकि, अबतें ।।
रत्नावली ने भी कहा था कि इस अस्थि – चर्ममय देह में जैसी प्रीति है, ऐसी ही प्रीति अगर भगवान राम में होती तो भव-भीति मिट जाती। इसीलिए वैराग्य की मूल प्रेरणा भगवदाराधन ही है।

तुलसी का निवास – स्थान
विरक्त हो जाने के उपरांत तुलसीदास ने काशी को अपना मूल निवास-स्थान बनाया। वाराणसी के तुलसीघाट, घाट पर स्थित तुलसीदास द्वारा स्थापित अखाड़ा, मानस और विनयपत्रिका के प्रणयन-कक्ष, तुलसीदास द्वारा प्रयुक्त होने वाली नाव के शेषांग, मानस की १७०४ ई० की पांडुलिपि, तुलसीदास की चरण-पादुकाएं आदि से पता चलता है कि तुलसीदास के जीवन का सर्वाधिक समय यहीं बीता। काशी के बाद कदाचित् सबसे अधिक दिनों तक अपने आराध्य की जन्मभूमि अयोध्या में रहे। मानस के कुछ अंश का अयोध्या में रचा जाना इस तथ्य का पुष्कल प्रमाण है।
तीर्थाटन के क्रम में वे प्रयाग, चित्रकूट, हरिद्वार आदि भी गए। बालकांड के “”दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि-भरि कांवर चले कहारा” तथा “सूखत धान परा जनु पानी” से उनका मिथिला-प्रवास भी सिद्ध होता है। धान की खेती के लिए भी मिथिला ही प्राचीन काल से प्रसिद्ध रही है। धान और पानी का संबंध-ज्ञान बिना मिथिला में रहे तुलसीदास कदाचित् व्यक्त नहीं करते। इससे भी साबित होता है कि वे मिथिला में रहे।

विरोध और सम्मान
जनश्रुतियों और अनेक ग्रंथों से पता चलता है कि तुलसीदास को काशी के कुछ अनुदार पंडितों के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा था। उन पंडितों ने रामचरितमानस की पांडुलिपि को नष्ट करने और हमारे कवि के जीवन पर संकट ढालने के भी प्रयास किए थे। जनश्रुतियों से यह भी पता चलता है कि रामचरितमानस की विमलता और उदात्तता के लिए विश्वनाथ जी के मन्दिर में उसकी पांडुलिपि रखी गई थी और भगवान विश्वनाथ का समर्थन मानस को मिला था। अन्ततः, विरोधियों को तुलसी के सामने नतमस्तक होना पड़ा था। विरोधों का शमन होते ही कवि का सम्मान दिव्य-गंध की तरह बढ़ने और फैलने लगा। कवि के बढ़ते हुए सम्मान का साक्ष्य कवितावली की निम्नांकित पंक्तियां भी देती हैं –
जाति के सुजाति के कुजाति के पेटागिबस
खाए टूक सबके विदित बात दुनी सो ।
मानस वचनकाय किए पाप सति भाय
राम को कहाय दास दगाबाज पुनी सो ।राम नाम को प्रभाउ पाउ महिमा प्रताप
तुलसी से जग मानियत महामुनी सो ।
अति ही अभागो अनुरागत न राम पद
मूढ़ एतो बढ़ो अचरज देखि सुनी सो ।।
(कवितावली, उत्तर, ७२)
तुलसी अपने जीवन-काल में ही वाल्मीकि के अवतार माने जाने लगे थे –
त्रेता काव्य निबंध करिव सत कोटि रमायन ।
इक अच्छर उच्चरे ब्रह्महत्यादि परायन ।।पुनि भक्तन सुख देन बहुरि लीला विस्तारी ।
राम चरण रस मत्त रहत अहनिसि व्रतधारी ।
संसार अपार के पार को सगुन रुप नौका लिए ।
कलि कुटिल जीव निस्तार हित बालमीकि तुलसी भए ।।
(भक्तमाल, छप्पय १२९)
पं० रामनरेश त्रिपाठी ने काशी के सुप्रसिद्ध विद्वान और दार्शनिक श्री मधुसूदन सरस्वती को तुलसीदास का समसामयिक बताया है। उनके साथ उनके वादविवाद का उल्लेख किया है और मानस तथा तुलसी की प्रशंसा में लिखा उनका श्लोक भी उद्घृत किया है। उस श्लोक से भी तुलसीदास की प्रशस्ति का पता मालूम होता है।
आनन्दकाननेह्यस्मिन् जंगमस्तुलसीतरु:
कविता मंजरी यस्य, राम-भ्रमर भूषिता ।

जीवन की सांध्य वेला
तुलसीदास को जीवन की सांध्य वेला में अतिशय शारीरिक कष्ट हुआ था। तुलसीदास बाहु की पीड़ा से व्यथित हो उठे तो असहाय बालक की भांति आराध्य को पुकारने लगे थे।
घेरि लियो रोगनि कुजोगनि कुलोगनि ज्यौं,
बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पोर जारिये जवासे जस,
रोष बिनु दोष, धूम-मूलमलिनाई है ।।करुनानिधान हनुमान महा बलबान,
हेरि हैसि हांकि फूंकि फौजें तै उड़ाई है ।
खाए हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि,
केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ।
(हनुमान बाहुक, ३५)
निम्नांकित पद से तीव्र पीड़ारुभूति और उसके कारण शरीर की दुर्दशा का पता चलता हैं –
पायेंपीर पेटपीर बांहपीर मुंहपीर
जर्जर सकल सरी पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह,
मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।हौं तो बिन मोल के बिकानो बलि बारे हीं तें,
ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुंभज के निकट बिकल बूड़े गोखुरनि,
हाय राम रा ऐरती हाल कहुं भई है ।।
दोहावली के तीन दोहों में बाहु-पीड़ा की अनुभूति –
तुलसी तनु सर सुखजलज, भुजरुज गज बर जोर ।
दलत दयानिधि देखिए, कपिकेसरी किसोर ।।
भुज तरु कोटर रोग अहि, बरबस कियो प्रबेस ।
बिहगराज बाहन तुरत, काढिअ मिटे कलेस ।।
बाहु विटप सुख विहंग थलु, लगी कुपीर कुआगि ।
राम कृपा जल सींचिए, बेगि दीन हित लागि ।।
आजीवन काशी में भगवान विश्वनाथ का राम कथा का सुधापान कराते-कराते असी गंग के तीर पर सं० १६८० की श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन तुलसीदास पांच भौतिक शरीर का परित्याग कर शाश्वत यशःशरीर में प्रवेश कर गए।

सूरदास का जीवन

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सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है। “साहित्य लहरी’ सूर की लिखी रचना मानी जाती है। इसमें साहित्य लहरी के रचना-काल के सम्बन्ध में निम्न पद मिलता है –
मुनि पुनि के रस लेख ।
दसन गौरीनन्द को लिखि सुवल संवत् पेख ।।
इसका अर्थ विद्वानों ने संवत् १६०७ वि० माना है, अतएव “साहित्य लहरी’ का रचना काल संवत् १६०७ वि० है। इस ग्रन्थ से यह भी प्रमाण मिलता है कि सूर के गुरु श्री बल्लभाचार्य थे –
सूरदास का जन्म सं० १५३५ वि० के लगभग ठहरता है, क्योंकि बल्लभ सम्प्रदाय में ऐसी मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का जन्म उक्त संवत् की वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म-तिथि वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् १५३५ वि० समीचीन जान पड़ती है। अनेक प्रमाणों के आधार पर उनका मृत्यु संवत् १६२० से १६४८ वि० के मध्य स्वीकार किया जाता है।

रामचन्द्र शुक्ल जी के मतानुसार सूरदास का जन्म संवत् १५४० वि० के सन्निकट और मृत्यु संवत् १६२० वि० के आसपास माना जाता है।

श्री गुरु बल्लभ तत्त्व सुनायो लीला भेद बतायो।
सूरदास की आयु “सूरसारावली’ के अनुसार उस समय ६७ वर्ष थी। ‘चौरासी वैष्णव की वार्ता’ के आधार पर उनका जन्म रुनकता अथवा रेणु का क्षेत्र (वर्तमान जिला आगरान्तर्गत) में हुआ था। मथुरा और आगरा के बीच गऊघाट पर ये निवास करते थे। बल्लभाचार्य से इनकी भेंट वहीं पर हुई थी। “भावप्रकाश’ में सूर का जन्म स्थान सीही नामक ग्राम बताया गया है। वे सारस्वत ब्राह्मण थे और जन्म के अंधे थे। “आइने अकबरी’ में (संवत् १६५३ वि०) तथा “मुतखबुत-तवारीख’ के अनुसार सूरदास को अकबर के दरबारी संगीतज्ञों में माना है।
जन्म स्थान

अधिक विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में ये आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे।

खंजन नैन रुप मदमाते ।
अतिशय चारु चपल अनियारे,
पल पिंजरा न समाते ।।
चलि – चलि जात निकट स्रवनन के,
उलट-पुलट ताटंक फँदाते ।
“सूरदास’ अंजन गुन अटके,
नतरु अबहिं उड़ जाते ।।
क्या सूरदास अंधे थे ?
सूरदास श्रीनाथ भ की “संस्कृतवार्ता मणिपाला’, श्री हरिराय कृत “भाव-प्रकाश”, श्री गोकुलनाथ की “निजवार्ता’ आदि ग्रन्थों के आधार पर, जन्म के अन्धे माने गए हैं। लेकिन राधा-कृष्ण के रुप सौन्दर्य का सजीव चित्रण, नाना रंगों का वर्णन, सूक्ष्म पर्यवेक्षणशीलता आदि गुणों के कारण अधिकतर वर्तमान विद्वान सूर को जन्मान्ध स्वीकार नहीं करते।

श्यामसुन्दरदास ने इस सम्बन्ध में लिखा है – “”सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं थे, क्योंकि श्रृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई जन्मान्ध नहीं कर सकता।” डॉक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है – “”सूरसागर के कुछ पदों से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि सूरदास अपने को जन्म का अन्धा और कर्म का अभागा कहते हैं, पर सब समय इसके अक्षरार्थ को ही प्रधान नहीं मानना चाहिए।

सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं –
१ सूरसागर
२ सूरसारावली
३ साहित्य-लहरी
४ नल-दमयन्ती और
५ ब्याहलो।
उपरोक्त में अन्तिम दो अप्राप्य हैं।
नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के १६ ग्रन्थों का उल्लेख है। इनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं। इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, साहित्य लहरी की प्राप्त प्रति में बहुत प्रक्षिप्तांश जुड़े हुए हैं।

सूरसागर
सूरसागर में लगभग एक लाख पद होने की बात कही जाती है। किन्तु वर्तमान संस्करणों में लगभग पाँच हजार पद ही मिलते हैं। विभिन्न स्थानों पर इसकी सौ से भी अधिक प्रतिलिपियाँ प्राप्त हुई हैं, जिनका प्रतिलिपि काल संवत् १६५८ वि० से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक है इनमें प्राचीनतम प्रतिलिपि नाथद्वारा (मेवाड़) के “सरस्वती भण्डार’ में सुरक्षित पायी गई हैं।

सूरसागर सूरदासजी का प्रधान एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें प्रथ्#ंम नौ अध्याय संक्षिप्त है, पर दशम स्कन्ध का बहुत विस्तार हो गया है। इसमें भक्ति की प्रधानता है। इसके दो प्रसंग “कृष्ण की बाल-लीला’ और “भ्रमर-गीतसार’ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

सूरसागर की सराहना करते हुए डॉक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है – “”काव्य गुणें की इस विशाल वनस्थली में एक अपना सहज सौन्दर्य है। वह उस रमणीय उद्यान के समान नहीं जिसका सौन्दर्य पद-पद पर माली के कृतित्व की याद दिलाता है, बल्कि उस अकृत्रिम वन-भूमि की भाँति है जिसका रचयिता रचना में घुलमिल गया है।” दार्शनिक विचारों की दृष्टि से “भागवत’ और “सूरसागर’ में पर्याप्त अन्तर है।

सूर सारावली
इसमें ११०७ छन्द हैं। यह सम्पूर्ण ग्रन्थ एक “वृहद् होली’ गीत के रुप में रचित हैं। इसकी टेक है – “”खेलत यह विधि हरि होरी हो, हरि होरी हो वेद विदित यह बात।” इसका रचना-काल संवत् १६०२ वि० निश्चित किया गया है, क्योंकि इसकी रचना सूर के ६७वें वर्ष में हुई थी।

साहित्य लहरी
यह ११८ पदों की एक लघु रचना है। इसके अन्तिम पद में सूरदास का वंशवृक्ष दिया है, जिसके अनुसार सूरदास का नाम सूरजदास है और वे चन्दबरदायी के वंशज सिद्ध होते हैं। अब इसे प्रक्षिप्त अंश माना गया है ओर शेष रचना पूर्ण प्रामाणिक मानी गई है। इसमें रस, अलंकार और नायिका-भेद का प्रतिपादन किया गया है। इस कृति का रचना-काल स्वयं कवि ने दे दिया है जिससे यह संवत् विक्रमी में रचित सिद्ध होती है। रस की दृष्टि से यह ग्रन्थ विशुद्ध श्रृंगार की कोटि में आता है।

राम नाम का मरम है आना

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गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के बालकांड में भगवान शिव के मुख से कुछ ‘अनमोल’ वचन कहलवाए हैं। किंतु ये वचन इतने कटु और अशोभनीय हैं कि सहज विश्वास नहीं होता कि ये रामचरितमानस जैसे महान और पवित्र काव्य के ही अंश हैं। अपशब्दों का ऐसा कवित्वमय प्रयोग विरले ही संसार के किसी अन्य महान साहित्य में देखने को मिलेगा। जरा आप भी एक बार फिर से इन अनमोल वचनों पर गौर फरमाएँ:

कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच।
पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच।। 114 ।।

अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई विषय मुकर मन लागी।।
लंपट कपटी कुटिल विसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी।।
कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानि।।
मुकर मलिन अरु नयन बिहीना। रामरूप देखहिं किमि दीना।।
जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।।
हरिमाया बस जगत भुमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं।।
बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।।
जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन कर कहा करिअ नहिं काना।।

कबीर के कई अध्येताओं का मानना है कि तुलसीदासजी द्वारा रामचरितमानस में व्यक्त किए गए उपर्युक्त विचार राम के संबंध में कबीर की अवधारणा की भर्त्सना करने के उद्देश्य से ही शिव-पार्वती संवाद के रूप में प्रस्थापित किए गए हैं। यहाँ तक कि पूरे उत्तरकांड की रचना के पीछे एकमात्र यही उद्देश्य माना जाता है। प्रश्न उठता है कि आखिर इन दो महान राम भक्त कवियों के बीच दृष्टिकोण का ऐसा घोर अतंराल कहाँ है कि तुलसीदासजी को इतने कटुतम शब्दों में कबीर की ‘बानी’ पर प्रहार करने के लिए उद्यत होना पड़ा। इतना ही नहीं, हिन्दी साहित्य के महानतम आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कबीर की राम के प्रति भक्ति को महज शुष्क ज्ञानमार्गी साधना बतलाकर उनकी रचनाओं को श्रेष्ठ साहित्य का दर्जा देने से इन्कार कर दिया। यदि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की कविता के महत्व को पहचानने और उसे साहित्य में प्रतिष्ठित करने के लिए उत्कट प्रयास नहीं किए होते तो आज हम कबीर की रचनाओं के आस्वादान से वंचित रह गए होते। प्रस्तुत लेख में हम तुलसी के राम और कबीर के राम के बीच बुनियादी अंतर की पड़ताल करने और उसके कारणों की तह में जाने का प्रयास करेंगे।

कबीर के राम पुराण-प्रतिपादित अवतारी राम नहीं हैं। अवतारी राम कबीर को पसंद नहीं आते। अवतारवाद और कबीर के विचारों में कोई सामंजस्य नहीं है। कबीर के राम बुनियादी रूप से तुलसी के राम से भिन्न हैं। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं :

नां दशरथ धरि औतरि आवा। नां लंका का रावं सतावा।

कहै कबीर विचार करि, ये ऊले व्यवहार।

याहीथें जे अगम है, सो वरति रह्या संसार।’

कबीर के राम तो अगम हैं और संसार के कण-कण में विराजते हैं। कबीर के राम इस्लाम के एकेश्वरवादी, एकसत्तावादी खुदा भी नहीं हैं। इस्लाम में खुदा या अल्लाह को समस्त जगत एवं जीवों से भिन्न एवं परम समर्थ माना जाता है। पर कबीर के राम परम समर्थ भले हों, लेकिन समस्त जीवों और जगत से भिन्न तो कदापि नहीं हैं। बल्कि इसके विपरीत वे तो सबमें व्याप्त रहने वाले रमता राम हैं। वह कहते हैं:

व्यापक ब्रह्म सबनिमैं एकै, को पंडित को जोगी।

रावण-राव कवनसूं कवन वेद को रोगी।

कबीर राम की किसी खास रूपाकृति की कल्पना नहीं करते, क्योंकि रूपाकृति की कल्पना करते ही राम किसी खास ढाँचे (फ्रेम) में बँध जाते, जो कबीर को किसी भी हालत में मंजूर नहीं। कबीर राम की अवधारणा को एक भिन्न और व्यापक स्वरूप देना चाहते थे। इसके कुछ विशेष कारण थे, जिनकी चर्चा हम इस लेख में आगे करेंगे। किन्तु इसके बावजूद कबीर राम के साथ एक व्यक्तिगत पारिवारिक किस्म का संबंध जरूर स्थापित करते हैं। राम के साथ उनका प्रेम उनकी अलौकिक और महिमाशाली सत्ता को एक क्षण भी भुलाए बगैर सहज प्रेमपरक मानवीय संबंधों के धरातल पर प्रतिष्ठित है।

कबीर नाम में विश्वास रखते हैं, रूप में नहीं। हालाँकि भक्ति-संवेदना के सिद्धांतों में यह बात सामान्य रूप से प्रतिष्ठित है कि ‘नाम रूप से बढ़कर है’, लेकिन कबीर ने इस सामान्य सिद्धांत का क्रांतिधर्मी उपयोग किया। कबीर ने राम-नाम के साथ लोकमानस में शताब्दियों से रचे-बसे संश्लिष्ट भावों को उदात्त एवं व्यापक स्वरूप देकर उसे पुराण-प्रतिपादित ब्राह्मणवादी विचारधारा के खाँचे में बाँधे जाने से रोकने की कोशिश की। इस बात को बाद में कबीर के ही टक्कर के, परंतु ब्राह्मणवादी विचारधारा के पोषक भक्त-संत तुलसीदास पचा नहीं सके और उन्होंने एक तरह से राम-नाम के साथ कबीर द्वारा संबद्ध की गई क्रांतिधर्मिता को निस्तेज करने के लिए ‘रामचरितमानस’ की रचना की। कबीर के राम-नाम की अवधारणा को अपने आस्थापरक विवेक से काफी कुछ महात्मा गाँधी ने भी समझा और आत्मसात किया था। यह अवधारणा लाख षड्यंत्रों और कुचेष्टाओं के बावजूद लोकमानस में अब भी जीवित है और आगे बनी रहने वाली है।

कबीर के लिए राम का वेद-पुराण सम्मत होना जरूरी नहीं है। यह अलग बात है कि तुलसीदासजी और उनके बाद से लेकर अब तक के बहुत से विद्वानों ने कबीर के राम को वेद-पुराण प्रतिपादित अवधारणा के दायरे में समेट लेने की बेहद कोशिश की है। लेकिन हैरानी और सुखद आश्चर्य की बात है कि वे लोग भी जो वेदों और पुराणों की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं रखते, कबीर के ‘रमता राम’ की अवधारणा से न सिर्फ सहमत होते हैं, बल्कि उसे चित्त-संस्कारवश आत्मसात भी करते हैं।

कबीर में अपनी राम-विषयक अवधारणा को लेकर कोई मतांधता नहीं दिखाई देती। वे इस संबंध में कोई अड़ियल रुख नहीं अपनाते। वे तुलसीदासजी की तरह कृष्ण की मूर्ति के सामने भी यह हठ नहीं करते कि धनुष-बाण लेकर आओ, तब ही मैं तुम्हारे सामने शीश नवाऊंगा। ऐसी आग्रही भक्ति का भाव न तो कबीर में दिखाई देता है और न ही किसी अन्य निर्गुण भक्त संत में। बल्कि कबीर की दृष्टि तो ठीक इसके विपरीत है। अवतारवाद से संबद्ध कुछ सामाजिक अवधारणाओं के चलते उसका विरोध करने के बावजूद कबीर अवतारों के उन लीला-प्रसंगों को मुग्ध-भाव से स्वीकार करते हैं जिनमें प्रेम और ईश्वर की सर्वव्यापकता के मार्मिक चित्रण हुए हैं। कबीर राम के पर्यायवाची के रूप में ईश्वर के उन बहुत से नामों का प्रयोग भी करते हैं जो पुराण-परंपरा और विभिन्न संप्रदाय-मज़हबों में ईश्वर के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। वे अपने राम को हरि, गोविन्द, केशव, माधव, नरसिंह, अल्लाह, खुदा, साहब, करीम, रहीम, रब, गोरख, विष्णु, महादेव, सिद्ध, नाथ आदि कुछ भी कह लेते थे, कहने की रौ में जो नाम सहज रूप से आ जाए। लेकिन ईश्वर के लिए वह चाहे जिस किसी नाम का प्रयोग करते हों, ऐसा करते समय ईश्वर के प्रति उनकी धारणा में कोई अंतर नहीं आता। इस मामले में सगुण भक्त कवि कुछ विशेष सजगता बरतते हैं, वे अपने आराध्य को ब्रह्म का अवतार मानते हुए भी न सिर्फ उनके किसी खास रूप के प्रति निष्ठा रखते हैं, बल्कि उनके नाम के पर्यायवाचियों का प्रयोग करते हुए भी सावधानी बरतते हैं। वे अपने आराध्य को दूसरे नाम-रूपों से भिन्न बताने की सतर्क कोशिश करते हैं। इन सबके बावजूद यह एक गंभीर अध्ययन का विषय है कि कबीर जैसे निर्गुण भक्त कवि ‘राम’ नाम पर ही विशेष बल क्यों देते हैं।

कबीर के राम निर्गुण-सगुण के भेद से परे हैं। दरअसल उन्होंने अपने राम को शास्त्र-प्रतिपादित अवतारी, सगुण, वर्चस्वशील वर्णाश्रम व्यवस्था के संरक्षक राम से अलग करने के लिए ही ‘निर्गुण राम’ शब्द का प्रयोग किया-‘निर्गुण राम जपहु रे भाई।’ इस ‘निर्गुण’ शब्द को लेकर भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं। कबीर का आशय इस शब्द से सिर्फ इतना है कि ईश्वर को किसी नाम, रूप, गुण, काल आदि की सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता। जो सारी सीमाओं से परे हैं और फिर भी सर्वत्र हैं, वही कबीर के निर्गुण राम हैं। इसे उन्होंने ‘रमता राम’ नाम दिया है। अपने राम को निर्गुण विशेषण देने के बावजूद कबीर उनके साथ मानवीय प्रेम संबंधों की तरह के रिश्ते की बात करते हैं। कभी वह राम को माधुर्य भाव से अपना प्रेमी या पति मान लेते हैं तो कभी दास्य भाव से स्वामी। कभी-कभी वह राम को वात्सल्य मूर्ति के रूप में माँ मान लेते हैं और खुद को उनका पुत्र। निर्गुण-निराकार ब्रह्म के साथ भी इस तरह का सरस, सहज, मानवीय प्रेम कबीर की भक्ति की विलक्षणता है। यह दुविधा और समस्या दूसरों को भले हो सकती है कि जिस राम के साथ कबीर इतने अनन्य, मानवीय संबंधपरक प्रेम करते हों, वह भला निर्गुण कैसे हो सकते हैं, पर खुद कबीर के लिए यह समस्या नहीं है। वह कहते भी हैं:

“संतौ, धोखा कासूं कहिये। गुनमैं निरगुन, निरगुनमैं गुन, बाट छांड़ि क्यूं बहिसे!”

लेकिन बाद में तुलसीदासजी ने जब ‘रामचरितमानस’ में ‘अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदा’ कहकर कबीर के ‘रमता राम’ और अपने ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ अवतारी राम को ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के आधिपत्यवादी उद्देश्यों के तहत एक में मिलाने की कोशिश की, तब से गड़बड़ियाँ शुरू हो गईं और यह गड़बड़ी आज तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पीड़ादायी सामाजिक-राजनीतिक दंश के रूप में हमारे सामने है।

कबीर को सीधे-सीधे अवतारी राम से विशेष परेशानी नहीं है। कबीर को परेशानी है अवतारी राम के साथ जुड़ी उस पुराण-प्रतिपादित अवधारणा से, जिसके मुताबिक राम वर्णाश्रम व्यवस्था रूपी धर्म की रक्षा करने और उस व्यवस्था की ‘मर्यादा’ को न मानने वालों को दंडित करने के लिए अवतार ग्रहण करते हैं। धर्म की पुराण-प्रतिपादित अवधारणा वर्णाश्रम-व्यवस्था का ही पर्यायवाची है। जबकि कबीर इस वर्णाश्रम-व्यवस्था के घोरतम विरोधी हैं। वह वर्णाश्रम व्यवस्था कबीर को कतई मान्य नहीं है, जिसमें किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए अछूत और पशु से भी हीन मान लिया जाता हो, जिसमें सिर्फ इसलिए उसे ज्ञान और भक्ति के अयोग्य ठहरा दिया जाता हो, क्योंकि वह किसी खास जाति में पैदा हुआ है। कबीर का उस वर्ण-व्यवस्था के प्रति गहरा विरोध है जिसमें बहुजन समाज के व्यक्तियों को शताब्दियों से पीढ़ी दर पीढ़ी दंडित किया जा रहा है और उन्हें इस दंड के कारण का पता तक नहीं है।

“कबीर के नस-नस में इस अकारण दंड के प्रति विद्रोह का भाव भरा था”- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की यह पंक्ति वर्णाश्रम व्यवस्था के प्रति कबीर के तीव्र विरोध को सटीकता से रेखांकित करती है। वर्णाश्रम-व्यवस्था के हितचिंतकों द्वारा अपने उद्देश्यों के अनुकूल राम कथा को इस सूक्ष्मता से बुना गया है कि लोकमानस में वे पूरी तरह से रच-बस गई हैं। यह परिघटना कोई थोड़े समय में घटित नहीं हुई है। निश्चय ही यह क्रम कबीर के बहुत पहले से ही, पुराणों के शुरुआती रचना-काल से ही शुरु हो गया होगा। कबीर को भी लोकपरंपरा से अवतारी राम के जीवन की वे घटनाएँ जानने-सुनने को मिली होंगी और उनपर सहज विश्वास कर लेने के कारण वह उन सबको सच भी मानते होंगे। वे घटनाएँ कबीर की मानवीय संवेदना के ठीक विपरीत थीं। कबीर कैसे स्वीकार कर सकते थे कि उन्हीं के समान एक दलित, शंबूक को सिर्फ इस अपराध के लिए कि वह शूद्र होते हुए भी आत्म-साक्षात्कार पाने की अनधिकारिक चेष्टा कर रहा था, जिस राम ने मृत्युदंड दे दिया था, वह ईश्वर के अवतार हैं, खुद परब्रह्म हैं!

कबीर की संवेदना में जिस ईश्वर की कल्पना और अनुभूति व्याप्त है, वह ईश्वर तो न सिर्फ सबको एक समान मानता है, बल्कि सबमें एक समान भाव से व्याप्त है। उनकी संवेदना में बसे राम तो ‘बाहर-भीतर सकल निरंतर’ हैं। ब्राह्मणवादी वर्चस्वशील व्यवस्था के स्वार्थों और हितों के अनुरूप ढाले गए, पुराण-प्रतिपादित अवतारी राम भला कबीर की विराट मानवीय संवेदना के धरातल पर कैसे प्रतिष्ठित हो सकते थे! ‘रमता राम’ एक मौलिक अवधारणा है। हालाँकि कबीर के पहले भी यह अवधारणा विद्यमान थी, लेकिन जनसामान्य में इस अवधारणा को पहली बार कबीर ने ही प्रतिष्ठित किया। ‘राम’ नाम की कुछ व्याख्याएँ पहले से प्रचलित थीं। एक व्याख्या यह थी कि निरंतर ब्रह्म के ध्यान में लीन रहने वाले योगियों के हृदय में जो रमण करते हैं, वह राम हैं। एक दूसरी व्याख्या इससे भी अधिक व्यापक थी कि जो सृष्टि के कण-कण में रमण करते हैं, वही राम हैं। भक्त प्रह्लाद ने भी इसी भाव का साक्षात कर दिखाया था। कबीर की संवेदना इसी व्याख्या के अनुकूल थी। यह ईश्वर की सबसे सहज और सरल व्याख्या थी। कबीर ने कण-कण में रमने वाले इसी ‘रमता राम’ को अपना आराध्य बनाया। राम-नाम का मंत्र तो उन्हें सदगुरु से ही मिल गया था। गुरु रामानंद की राम-नाम की अवधारणा भी व्यापक थी, वह राम को महज अवतार नहीं मानते थे, बल्कि स्वयं परात्पर ब्रह्म मानते थे। यदि यह सच है कि गुरु रामानंद से ही कबीर को भक्ति और राम-नाम की दीक्षा मिली थी, तब यह भी स्वीकार किया जा सकता है कि कबीर के रमता राम की अवधारणा में भी रामानंद का विशेष प्रभाव है। लेकिन कबीर के ‘रमता राम’ में जो धार है, जो तेजस्विता है, वह कबीर की अपनी है। उन्होंने अपने ‘रमता राम’ को वर्णाश्रम-व्यवस्था के प्रतीक ‘अवतारी राम’ के मुकाबले खड़ा कर दिया और यह एक अचूक अस्त्र साबित हुआ।

लोकमानस की सतत संवर्धनशील परिकल्पना भी राम को सिर्फ कथानकों और आख्यानों से कहीं बहुत व्यापक मानती आई है। आख्यानों के बाहर के राम को कबीर ने अपनी विलक्षण भक्ति के माध्यम से परिपुष्ट कर दिया। ‘रमता राम’ की, आख्यानों के बाहर के राम की, निर्गुण राम की, समस्त मूर्तियों से भी अधिक व्यापक मूर्ति की भक्ति भी संभव है, यह बात कबीर ने भली-भाँति सिद्ध कर दी। कबीर के राम को हर कोई अपनी भावना, अपनी कल्पना के अनुसार अपना सकता है। हर कोई अपना खुद का ‘राम’ गढ़ सकता है। हर कोई सहज भक्ति कर सकता है। ‘जहँ-जहँ डोलों सोई परिक्रमा, जो कछु करों सो सेवा। जब सोवों तब करों दंडवत, पूजों और न देवा।’ इस तरह कबीर ने बिना किसी से मंदिर में जाने का अधिकार माँगे सबको राम सुलभ करा दिया। अब चमार, जुलाहे और अछूत भी राम को पूज सकते हैं, पा सकते हैं। कबीर ने राम का लोकतंत्रीकरण कर दिया। दरअसल, ईश्वर का यही लोकतंत्रीकरण हिन्दी साहित्य का भक्ति आंदोलन था, जिसकी स्वतंत्रतामूलक एवं समतामूलक प्रवृत्तियों को तमाम कोशिशों के बावजूद दोबारा कभी अवरुद्ध नहीं किया जा सका। कबीर के ‘रमता राम’ की आज के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में यही उपादेयता और प्रासंगिकता है।

यदि काव्य कला, सौंदर्य और संवेदना के धरातल पर भी देखें तो कबीर की रचनाओं को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे महान आलोचकों द्वारा शुष्क, ज्ञानमार्गी, अटपटी, रहस्यवादी, ज्ञान की प्रकृत परंपरा और प्रक्रिया का निषेध करने वाली, लोकविरोधी आदि विशेषण दिया जाना अत्याचार ही लगता है। जिस लोकधर्म और लोकमंगल की भावना को काव्य का केन्द्रीय सरोकार बताया जाता है, उसी कसौटी पर कबीर की काव्य-संवेदना किसी भी अन्य कवि से उन्नीस नहीं ठहराई जा सकती। व्यापक मानवता के प्रति उन्मुख कबीर के काव्यगत सरोकार सिर्फ इसलिए लोकविरुद्ध नहीं हो जाते कि वह ईश्वर को किसी खास देश-काल-रूप-कथानक की सीमा में मानने की बजाय उसे सृष्टि के कण-कण में व्याप्त मानते हैं। कबीर सिर्फ इसलिए रहस्यवादी और ज्ञान की प्रकृत परंपरा का निषेध करने वाले नहीं हो जाते क्योंकि वह संस्कृत के आदिम ग्रंथों में लिखी हुई बातों को बिना कोई तर्क-विवेक किए ज्यों-का-त्यों स्वीकार करने से इन्कार कर देते हैं और अपनी ‘आँखन देखी’ सच पर डटे रहते हैं। कबीर की भाषा सिर्फ इसलिए शुष्क और अटपटी नहीं हो जाती कि वह काव्य-परंपरा से अनभिज्ञ हैं और वह उसकी परवाह भी नहीं करते। कबीर की भाषा कितनी सरस और काव्योनुकूल है इसका पता तो सिर्फ इसी से लग जाता है कि एक निरक्षर संत की वाणी होकर भी वह सैकड़ों वर्षों से लोककंठों में सुरक्षित है और आगे भी सुरक्षित रहने वाली है। और यह तो सचमुच आश्चर्य की बात है कि कबीर जैसे प्रेम के अद्भुत दीवाने को आचार्य शुक्ल जैसे उद्भट विद्वान ने ज्ञानाश्रयी शाखा के कवियों के पाले में बैठाकर उनकी रचनाओं को मानक साहित्य मानने से इन्कार कर दिया।

अंत में एक बात और, क्या कबीर सचमुच राम-नाम के द्वंद्व से भी ऊपर उठे हुए नहीं थे? कबीर का वह मशहूर पद ‘अलह राम की गम नहीं, तहां कबीर रहा ल्यौ लगाय’ क्या हमें नामातीत की तरफ नहीं ले जाता? ‘हमरे राम रहीम करीमा, कैसो अलह राम सति सोई। बिसमिल मटि बिसंभर एकै, और न दूजा कोई।।’-यह पद क्या हमें नामों के द्वंद्व से भी मुक्त होने की प्रेरणा नहीं देता? जिस प्रश्न पर बुद्ध कभी मौन रह जाया करते थे, उसका उत्तर देने की व्यर्थता क्या कबीर ने भी अपनी संपूर्ण मुखरता के बावजूद इस तरह के पदों के माध्यम से नहीं सिद्ध कर दी? इस धरातल पर यदि हम कबीर को देखें तो वह उतने ही ऊँचे, विराट और असाधारण नजर आते हैं जितना हमारी मानस-कल्पना में बसा कोई भी महाकवि अधिक से अधिक हो सकता है।

भक्तिकालीन राजनैतिक परिस्थितियाँ

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भक्ति काल की शुरुवात 1243 के आसपास से मानी जाती है – ऐतिहासिक तौर पर 1206 से 1526 तक का काल दिल्ली सल्तनत का काल माना जाता है. इतने छोटे से काल में मम्लूक वंश (1206 से 1290 ), खिलजी वंश (1290 -1320 ), तुगलक वंश (1320 -1414 ), सैयाद वंश (1414–51), लोधी वंश (1451–1526) का शासन रहा. भक्तिकाल 1643 तक माना जाता है. 1526 से मुग़ल साम्राज्य की शुरुवात मानी जाती है

कबीर (1440  – 1518 ), जायसी (), रविदास (देहत्याग 1540 ), गुरु नानक (1469 – 1539 ), तुलसीदास (1532 – 1623 ), सूरदास (1478 – १५७३) का काल सचमुच ही संक्रांति का काल रहा होगा

तत्कालीन राजनीतिक वातावरण पूर्ण रुप से विषाक्त होगा । हिंदू- मुसलमानों के भीतर भी निरंतर ईर्ष्या और द्वेष का बोलबाला रहा होगा। तत्कालीन समृद्ध धर्मों बौद्ध, जैन, शैव एवं वैष्णवों के अंदर विभिन्न प्रकार की शाखाएँ निकल रही थी । सभी धर्मों के ठेकेदार आपस में लड़ने एवं झगड़ने में व्यस्त थे।लोदी वंश का सर्वाधिक यशस्वी सुल्तान, सिकंदर शाह सन् १४८९ ई. में गद्दी पर बैठा। सिकंदर को घरेलू परिस्थिति एवं कट्टर मुसलमानों का कड़ा विरोध सहना पड़ा। दुहरे विरोध के कारण वह अत्यंत असहिष्णु हो उठा था।

दूसरी तरफ भक्ति की जो धारा सातवीं शताब्दी में भारत के दक्षिण में शुरू हुई वह धीरे धीरे पूर्वी भाग मे फैलने लगी. आलवार बंधु नाम से कई प्रख्यात भक्त हुए हैं। इनमें से कई तथाकथित नीची जातियों के भी थे। वे बहुत पढे-लिखे नहीं थे, परंतु अनुभवी थे। आलवारों के पश्चात दक्षिण में आचार्यों की एक परंपरा चली जिसमें रामानुजाचार्य प्रमुख थे।

कृष्ण भक्ति काव्यधारा की प्रमुख विशेषतायें

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भारतीय धर्म और संस्कृति के इतिहास में कृष्ण सदैव एक अद्भुत व विलक्षण व्यक्तित्व माने जाते रहें है| हमारी प्राचीन ग्रंथों में यत्र – तत्र कृष्ण का उल्लेख मिलता है जिससे उनके जीवन के विभिन्न रूपों का पता चलता है|
यदि वैदिक व संस्कृत साहित्य के आधार पर देखा जाए तो कृष्ण के तीन रूप सामने आते है –
१. बाल व किशोर रूप, २. क्षत्रिय नरेश, ३. ऋषि व धर्मोपदेशक |
श्रीकृष्ण विभिन्न रूपों में लौकिक और अलौकिक लीलाएं दिखाने वाले अवतारी पुरूष हैं | गीता, महाभारत व विविध पुराणों में उन्ही के इन विविध रूपों के दर्शन होतें हैं |
कृष्ण महाभारत काल में ही अपने समाज में पूजनीय माने जाते थे | वे समय समय पर सलाह देकर धर्म और राजनीति का समान रूप से संचालन करते थे | लोगों में उनके प्रति श्रद्या और आस्था का भाव था | कृष्ण भक्ति काव्य धारा के कवियों ने अपनी कविताओं में राधा – कृष्णा की लीलाओं को प्रमुख विषय बनाकर वॄहद काव्य सॄजन किया। इस काव्यधारा की प्रमुख विशेशतायें इस प्रकार है–

१. राम और कृष्ण की उपासना

समाज में अवतारवाद की भावना के फलस्वरूप राम और कृष्ण दोनों के ही रूपों का पूजन किया गया |
दोनों के ही पूर्ण ब्रह्म का प्रतीक मानकर, आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत किया गया |
किंतु जहाँ राम मर्यादा पुरषोत्तम के रूप में सामने आते हैं, बही कृष्ण एक सामान्य परिवार में जन्म लेकर सामंती
अत्याचारों का विरोध करते हैं | वे जीवन में अधिकार और कर्तव्य के सुंदर मेल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं |

वे जिस तन्मयता से गोपियों के साथ रास रचाते हैं , उसी तत्परता से राजनीति का संचालन करते हैं या फ़िर महाभारत के युद्ध भूमि में गीता उपदेश देते हैं |
इस प्रकार से राम व कृष्ण ने अपनी अपनी चारित्रिक विशेषताओं द्वारा भक्तों के मानस को आंदोलित किया |

२. राधा-कृष्ण की लीलाएं

कृष्णा – भक्ति काव्य धारा के कवियों ने अपनी कविताओं में राधा – कृष्णा की लीलाओं को प्रमुख विषय बनाया |
श्रीमदभागवत में कृष्ण के लोकरंजक रूप को प्रस्तुत किया गया था |
भागवत के कृष्ण स्वंय गोपियों से निर्लिप्त रहते हैं |
गोपियाँ बार – बार प्रार्थना करती है , तभी वे प्रकट होतें हैं जबकि हिन्दी कवियों के कान्हा एक रसिक छैला बनकर गोपियों का दिल जीत लेते है |

सूरदास जी ने राधा – कृष्ण के अनेक प्रसंगों का चित्रण ककर उन्हें एक सजीव व्यक्तित्व प्रदान किया है |
हिन्दी कवियों ने कृष्ण ले चरित्र को नाना रूप रंग प्रदान किये हैं , जो काफी लीलामयी व मधुर जान पड़ते हैं |

३. वात्सल्य रस का चित्रण

पुष्टिमार्ग प्रारंभ हुया तो बाल कृष्ण की उपासना का ही चलन था | अत : कवियों ने कृष्ण के बाल रूप को पहले पहले चित्रित किया |
यदि वात्सल्य रस का नाम लें तो सबसे पहले सूरदास का नाम आता है, जिन्हें आप इस विषय का विशेषज्ञ कह सकते हैं | उन्होंने कान्हा के बचपन की सूक्ष्म से सूक्ष्म गतिविधियाँ भी ऐसी चित्रित की है, मानो वे स्वयं वहाँ उपस्थित हों |

मैया कबहूँ बढेगी चोटि ?
किनी बार मोहिं ढूध पियत भई , यह अजहूँ है छोटी |

सूर का वात्सल्य केवल वर्णन मात्र नहीं है | जिन जिन स्थानों पर वात्सल्य भाव प्रकट हो सकता था , उन सब घटनाओं को आधार बनाकर काव्य रचना की गयी है | माँ यशोदा अपने शिशु को पालने में सुला रही हैं और निंदिया से विनती करती है की वह जल्दी से उनके लाल की अंखियों में आ जाए |

जसोदा हरी पालनै झुलावै |
हलरावै दुलराय मल्हरावै जोई सोई कछु गावै |
मेरे लाल कौ आउ निंदरिया, काहै मात्र आनि सुलावै |
तू काहे न बेगहि आवे, तो का कान्ह बुलावें |

कृष्णा का शैशव रूप घटने लगता है तो माँ की अभिलाषाएं भी बढ़ने लगती हैं | उसे लगता है की कब उसका शिशु उसका शिशु उसका आँचल पकड़कर डोलेगा | कब, उसे माँ और अपने पिता को पिता कहके पुकारेगा , वह लिखते है –

जसुमति मन अभिलाष करै,
कब मेरो लाल घुतरुवनी रेंगै, कब घरनी पग द्वैक भरे,
कब वन्दहिं बाबा बोलौ, कब जननी काही मोहि ररै ,
रब घौं तनक-तनक कछु खैहे, अपने कर सों मुखहिं भरे
कब हसि बात कहेगौ मौ सौं, जा छवि तै दुख दूरि हरै|

सूरदास ने वात्सल्य में संयोग पक्ष के साथ – साथ वियोग का भी सुंदर वर्णन किया है | जब कंस का बुलावा लेकर अक्रूर आते हैं तो कृष्ण व बलराम को मथुरा जाना पङता है | इस अवसर पर सूरदास ने वियोग का मर्म्स्पर्सी
चित्र प्रस्तुत किया है | यशोदा बार बार विनती करती हैं कि कोई उनके गोपाल को जाने से रोक ले |

जसोदा बार बार यों भारवै
है ब्रज में हितू हमारौ, चलत गोपालहिं राखै

जब उधौ कान्हा का संदेश लेकर आते हैं, तो माँ यशोदा का हृदय अपने पुत्र के वियोग में रो देता है, वह देवकी को संदेश भिजवाती हैं |

संदेस देवकी सों कहियो।
हों तो धाय तिहारे सुत की कृपा करत ही रहियो||
उबटन तेल तातो जल देखत ही भजि जाने
जोई-चोर मांगत सोइ-सोइ देती करम-करम कर न्हाते |
तुम तो टेक जानतिही धै है ताऊ मोहि कहि आवै |
प्रात: उठत मेरे लाड लडैतहि माखन रोटी भावै |

४. श्रृंगार का वर्णन

कृष्ण भक्त कवियों ने कृष्ण व गोपियों के प्रेम वर्णन के रूप में पूरी स्वछंदता से श्रृंगार रस का वर्णन किया है | कृष्ण व गोपियों का प्रेम धीरे – धीरे विकसित होता है | कृष्ण , राधा व गोपियों के बीच अक्सर छेड़छाड़ चलती रहती है –

तुम पै कौन दुहावै गैया
इत चितवन उन धार चलावत, यहै सिखायो मैया |
सूर कहा ए हमको जातै छाछहि बेचनहारि |

कवि विद्यापति ने कृष्ण के भक्त-वत्सल रूप को छोड़ कर शृंगारिक नायक वाला रूप ही चित्रित किया है |
विद्यापति की राधा भी एक प्रवीण नायिका की तरह कहीं मुग्धा बनाती है , तो कभी कहीं अभिसारिका | विद्यापति
के राधा – कृष्ण यौवनावस्था में ही मिलते है और उनमे प्यार पनपने लगता है |
प्रेमी नायक , प्रेमिका को पहली बार देखता है तो रमनी की रूप पर मुग्ध हो जाता है |

सजनी भलकाए पेखन न मेल
मेघ-माल सयं तड़ित लता जनि
हिरदय सेक्ष दई गेल |

हे सखी ! मैं तो अच्छी तरह उस सुन्दरी को देख नही सका क्योंकि जिस प्रकार बादलों की पंक्ति में एका एअक
बिजली चमक कर चिप जाती है उसी प्रकार प्रिया के सुंदर शरीर की चमक मेरे ह्रदय में भाले की तरह उतर गयी
और मै उसकी पीडा झेल रहा हूँ |

विद्यापति की राधा अभिसार के लिए निकलती है तो सौंप पाँव में लिप्त जाता है | वह इसमे भी अपना भला
मानती है , कम से कम पाँव में पड़े नूपुरों की आवाज़ तो बंद हो गयी |

इसी प्राकार विद्यापति वियोग में भी वर्णन करते हैं | कृष्ण के विरह में राधा की आकुलता , विवशता ,
दैन्य व निराशा आदि का मार्मिक चित्रण हुया है |

सजनी, के कहक आओव मधाई |
विरह-पयोचि पार किए पाऊव, मझुम नहिं पति आई |
एखत तखन करि दिवस गमाओल, दिवस दिवस करि मासा |
मास-मास करि बरस गमाओल, छोड़ लूँ जीवन आसा |
बरस-बरस कर समय गमाओल, खोल लूं कानुक आसे |
हिमकर-किरन नलिनी जदि जारन, कि कर्ण माधव मासे |

इस प्रकार कृष्ण भक्त कवियों ने प्रेम की सभी अवस्थाओं व भाव-दशाओं का सफलतापूर्वक चित्रण किया है |

५. भक्ति भावना

यदि भक्त – भावना के विषय में बात करें तो कृष्ण भक्त कवियों में सूरदास , कुंमंदास व मीरा का नाम उल्लेखनीय है |

सूरदासजी ने वल्लभाचार्य जी से दीक्षा ग्रहण कर लेने के पूर्व प्रथम रूप में भक्ति – भावना की व्यंजना की है |

नाथ जू अब कै मोहि उबारो
पतित में विख्यात पतित हौं पावन नाम विहारो||

सूर के भक्ति काव्य में अलौकिकता और लौकितता , रागात्मकता और बौद्धिकता , माधुर्य और वात्सल्य सब मिलकर एकाकार हो गए हैं |

भगवान् कृष्ण के अनन्य भक्ति होने के नाते उनके मन से से सच्चे भाव निकलते हैं | उन्होंने ही भ्रमरनी परम्परा को नए रूप में प्रस्तुत किया | भक्त – शोरोमणि सूर ने इसमे सगुणोपासना का चित्रण , ह्रदय की अनुभूति के आधार पर किया है |

अंत में गोपियों अपनी आस्था के बल पर निर्गुण की उपासना का खंडन कर देती हैं |

उधौ मन नाहिं भए दस-बीस
एक हुतो सो गयो श्याम संग
को आराधै ईश |

मीराबाई कृष्ण को अपने प्रेमी ही नही , अपितु पति के रूप में भी स्मरण करती है | वे मानती
है कि वे जन्म – जन्म से ही कृष्ण की प्रेयसी व पत्नी रही हैं | वे प्रिय के प्रति आत्म – निवेदन व उपालंभ के रूप
में प्रणय – वेदना की अभिव्यक्ति करती है |

देखो सईयां हरि मन काठ कियो
आवन कह गयो अजहूं न आयो, करि करि गयो
खान-पान सुध-बुध सब बिसरी कैसे करि मैं जियो
वचन तुम्हार तुमहीं बिसरै, मन मेरों हर लियो
मीरां कहे प्रभु गिरधर नागर, तुम बिन फारत हियो |

भक्ति काव्य के क्षेत्र में मीरा सगुण – निर्गुण श्रद्धा व प्रेम , भक्ति व रहस्यवाद के अन्तर को भरते हुए , माधुर्य
भाव को अपनाती है | उन्हें तो अपने सांवरियां का ध्यान कराने में , उनको ह्रदय की रागिनी सुनाने व उनके सम्मुख नृत्य करने में ही आनंद आता है |

आली रे मेरे नैणां बाण पड़ीं |
चित चढ़ी मेरे माधुरी मुरल उर बिच आन अड़ी |
कब की ठाढ़ी पंछ निहारूं अपने भवन खड़ी |

६. ब्रज भाषा व अन्य भाषाओं का प्रयोग

अनेक कवियों ने निःसंकोच कृष्ण की जन्मभूमि में प्रचलित ब्रज भाषा को ही अपने काव्य में प्रयुक्त किया। सूरदास व नंददास जैसे कवियों ने भाषा के रूप को इतना निखार दिया कि कुछ समय बाद यह समस्त उत्तरी भारत की साहित्यिक भाषा बन गई।

यद्यपि ब्रज भाषा के अतिरिक्त कवियों ने अपनी-अपनी मातृ भाषाओं में कृष्ण काव्य की रचना की। विद्यापति ने मैथिली भाषा में अनेक भाव प्रकट किए।

सप्ति हे कतहु न देखि मधाई
कांप शरीर धीन नहि मानस, अवधि निअर मेल आई
माधव मास तिथि भयो माधव अवधि कहए पिआ गेल।

मीरा ने राजस्थानी भाषा में अपने भाव प्रकट किए।

रमैया बिन नींद न आवै
नींद न आवै विरह सतावै, प्रेम की आंच हुलावै।

प्रमुख कवि
महाकवि सूरदास को कृष्ण भक्त कवियों में सबसे ऊँचा स्थान दिया जाता है। इनके द्वारा रचित ग्रंथों में “सूर-सागर”, “साहित्य-लहरी” व “सूर-सारावली” उल्लेखनीय है। कवि कुंभनदास अष्टछाप कवियों में सबसे बड़े थे, इनके सौ के करीब पद संग्रहित हैं, जिनमें इनकी भक्ति भावना का स्पष्ट परिचय मिलता है।

संतन को कहा सींकरी सो काम।
कुंभनदास लाल गिरधर बिनु और सवै वे काम।

इसके अतिरिक्त परमानंद दास, कृष्णदास गोविंद स्वामी, छीतस्वामी व चतुर्भुज दास आदि भी अष्टछाप कवियों में आते हैं किंतु कवित्व की दृष्टि से सूरदास सबसे ऊपर हैं।
राधावल्लभ संप्रादय के कवियों में “हित-चौरासी” बहुत प्रसिद है, जिसे श्री हित हरिवंश जी ने लिखा है। हिंदी के कृष्ण भक्त कवियों में मीरा के अलावा बेलिकिशन रुक्मिनी के रचयिता पृथ्वीराज राठौर का नाम भी उल्लेखनीय है।

कृष्ण भक्ति धारा के कवियों ने अपने काव्य में भावात्मकता को ही प्रधानता दी। संगीत के माधुर्य से मानो उनका काव्य और निखर आया। इनके काव्य का भाव व कला पक्ष दोनों ही प्रौढ़ थे व तत्कालीन जन ने उनका भरपूर रसास्वादन किया। कृष्ण भक्ति साहित्य ने सैकड़ो वर्षो तक भक्तजनो का हॄदय मुग्ध किया । हिन्दी साहित्य के इतिहास मे कृष्ण की लीलाओ के गान, कृष्ण के प्रति सख्य भावना आदि की दॄष्टि से ही कृष्ण काव्य का महत्व नही है, वरन आगे चलकर राधा कृष्ण को लेकर नायक नायिका भेद , नख शिख वर्णन आदि की जो परम्परा रीतिकाल में चली , उस के बीज इसी काव्य मे सन्निहित है।रीतिकालीन काव्य मे ब्रजभाषा को जो अंलकॄत और कलात्मक रूप मिला , वह कृष्ण काव्य के कवियों द्वारा भाषा को प्रौढ़ता प्रदान करने के कारण ही संभव हो सका।

निर्गुण का अर्थ : निर्गुण काव्यधारा में ज्ञानमार्गी धारा

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इसमें तो कोई दो राय नहीं की संत कवियो ने जिस विचारधारा को लेकर रचना की उसका मूल सिद्ध तथा नाथ साहित्य में है। इसमें भी कोई असहमति नहीं है की इन कवियों की रचना सरल भाषा में सहज रूप में हैं

संत कवियों ने निगुर्ण साधना को अपनाया। अवतारवाद की बात इन कवियों ने नहीं की.लगभग सब संत अपढ़ थे परंतु अनुभव की दृष्टि से समृध्द थे। प्रायः सब सत्संगी थे और उनकी भाषा में कई बोलियों का मिश्रण पाया जाता है इसलिए इस भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ कहा गया है। साधारण जनता पर इन संतों की वाणी का ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा है। इन संतों में प्रमुख कबीरदास थे। अन्य मुख्य संत-कवियों के नाम हैं – नानक, रैदास, दादूदयाल, सुंदरदास तथा मलूकदास

क्योंकि निर्गुण साधना का आलम्बन निराकार है, फलस्वरूप वह जन साधारण के लिए सहज ग्राह्य नहीं हो पाती. बहुत से लोगों का मानना है की निर्गुण ब्रह्मज्ञान का विषय तो हो सकता है किंतु भक्ति साधना का नहीं, क्योंकि साधना तो किसी साकार मूर्त और विशिष्ट के प्रति ही उन्मुख हो सकती है। सामान्य जनता का विश्वास और आचरण भी इसी तर्क की पुष्टि करता दिखाई देता है। ब्रह्म के दो रूप विद्यमान हैं सगुण और निर्गुण। सगुण रूप की अपेक्षा निर्गुण रूप दुर्लभ है, सगुण भगवान सुगम है-

सगुण रूप सुलभ अति,
निर्गुण जानि नहीं कोई,
सुगम अगम नाना चरित,
सुनि-सुनि मन भ्रम होई

संत मत के अनुसार आत्मा-परमात्मा का अंश है. ज्ञानपूर्ण भक्ति को कबीर राम, सत्यपुरुष, अलख निरंजन, स्वामी और शून्य आदि से पुकारते हैं. निर्गण की उपासना, मिथ्याडंबर का विरोध, गुरु की महत्ता, जाति-पांति के भेदभाव का विरोध, वैयक्तिक साधना पर जोर, रहस्यवादी प्रवृत्ति, साधारण धर्म का प्रतिपादन, विरह की मार्मिकता, नारी के प्रति दोहरा दृष्टिकोण, भजन, नामस्मरण, संतप्त, उपेक्षित, उत्पीड़ित मानव को परिज्ञान प्रदान करना आदि संत काव्य के मुख्य प्रयोजन हैं.

संत शाखा के (आराध्य) “राम” तो अगम हैं और संसार के कण-कण में विराजते हैं। कबीर के राम इस्लाम के एकेश्वरवादी, एकसत्तावादी खुदा भी नहीं हैं। इस्लाम में खुदा या अल्लाह को समस्त जगत एवं जीवों से भिन्न एवं परम समर्थ माना जाता है। पर कबीर के राम परम समर्थ भले हों, लेकिन समस्त जीवों और जगत से भिन्न तो कदापि नहीं हैं। बल्कि इसके विपरीत वे तो सबमें व्याप्त रहने वाले रमता राम हैं।

संत शाखा की साधना ‘‘मानने से नहीं, ‘‘जानने से आरम्‍भ होती है।कबीर जैसे संत किसी के शिष्‍य नहीं, रामानन्‍द जैसे गुरु द्वारा चेताये हुए चेला हैं। उनके लिए राम रूप नहीं है, दशरथी राम नहीं है, उनके राम तो नाम साधना के प्रतीक हैं। उनके राम किसी सम्‍प्रदाय, जाति या देश की सीमाओं में कैद नहीं है। प्रकृति के कण-कण में, अंग-अंग में रमण करने पर भी जिसे अनंग स्‍पर्श नहीं कर सकता, वे अलख, अविनाशी, परम तत्‍व ही राम हैं। उनके राम मनुष्‍य और मनुष्‍य के बीच किसी भेद-भाव के कारक नहीं हैं। वे तो प्रेम तत्‍व के प्रतीक हैं।

कृष्णभक्त कवि

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कृष्णभक्ति शाखा के प्रमुख कवियों का परिचय
सूरदास, मीराबाई, स्वामी हरिदास, रसखान, चैतन्य महाप्रभु

सूरदास
हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ कृष्णभक्त कवि सूरदास का जन्म 1483 ई. के आस-पास हुआ था. इनकी मृत्यु अनुमानत: 1563 ई. के आस-पास हुई. इअनुश्रुति यह अवश्य है कि अकबर बादशाह सूरदास का यश सुनकर उनसे मिलने आए थे. ‘भक्तमाल’ में इनकी भक्ति, कविता एवं गुणों की प्रशंसा है तथा इनकी अंधता का उल्लेख है. ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ के अनुसार वे आगरा और मथुरा के बीच साधु या स्वामी के रूप में रहते थे.
सूर के काव्य में प्रकृतियाँ और जीवन का जो सूक्ष्म सौन्दर्य चित्रित है उससे यह नहीं लगता कि वे जन्मांध थे. उनके विषय में ऐसी कहानी भी मिलती है कि तीव्र अंतर्द्वन्द्व के किसी क्षण में उन्होंने अपनी आँखें फोड़ ली थीं. उचित यही मालूम पड़ता है कि वे जन्मांध नहीं थे. कालांतर में अपनी आँखों की ज्योति खो बैठे थे.
कृतियाँ
1. सूरसागर 2. सूरसारावली 3. साहित्य लहरी

 

रसखान

ये दिल्ली के एक पठान सरदार थे. ये लौकिक प्रेम से कृष्ण प्रेम की ओर उन्मुख हुए. रसखान ने कृष्ण का लीलागान गेयपदों में नहीं, सवैयों में किया है. रसखान को सवैया छंद सिद्ध था. जितने सहज, सरस, प्रवाहमय सवैये रसखान के हैं, उतने शायद ही किसी अन्य कवि के हों. रसखान का कोई ऐसा सवैया नहीं मिलता जो उच्च स्तर का न हो. उनके सवैये की मार्मिकता का बहुत बड़ा आधार दृश्यों और बाह्यांतर स्थितियों की योजना में है. वही योजना रसखान के सवैयों के ध्वनि-प्रवाह में है. ब्रजभाषा का ऐसा सहज प्रवाह अन्यत्र बहुत कम मिलता है.
रसखान सूफ़ियों का हृदय लेकर कृष्ण की लीला पर काव्य रचते हैं. उनमें उल्लास, मादकता और उत्कटता तीनों का संयोग है. ब्रज भूमि के प्रति जो मोह रसखान की कविताओं में दिखाई पड़ता है, वह उनकी विशेषता है.
कृतियाँ
1. प्रेमवाटिका
2. सुजान रसखान

 

मीराबाई

ये मेड़तिया के राठौर रत्नसिंह की पुत्री, राव दूदाजी की पौत्री और जोधपुर के बसानेवाले प्रसिद्ध राव जोधाजी की प्रपौत्री थीं. इनका जन्म सन् 1516 ई. में चोकड़ी नाम के एक गाँव में हुआ था और विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज जी के साथ हुआ था. ये आरंभ से ही कृष्ण भक्ति में लीन रहा करती थी. विवाह के उपरांत थोड़े दिनों में इनके पति का परलोकवास हो गया. ये प्राय: मंदिर में जाकर उपस्थित भक्तों और संतों के बीच श्रीकृष्ण भगवान् की मूर्ती के सामने आनंदमग्न होकर नाचती और गाती थी. कहते हैं कि इनके इस राजकुलविरूद्ध आचरण से इनके स्वजन लोकनिंदा के भय से रूष्ट रहा करते थे. यहाँ तक कहा जाता है कि इन्हें कई बार विष देने का प्रयत्न किया गया, पर विष का कोई प्रभाव इन पर न हुआ. घरवालों के व्यवहार से खिन्न होकर ये द्वारका और वृंदावन के मंदिरों में घूम-घूमकर भजन सुनाया करती थीं.
कृतियाँ
1. नरसी जी का मायरा
2. गीतगोविंद टीका
3. राग गोविंद
4. राग सोरठ के पद